35 मिनट में पूरा हुआ भारत का दूसरा शॉकवेव लीथोट्रिप्सी ट्रीटमेंट, जानें इस ट्रीटमेंट के बारे में सबकुछ

शॉकवेव इंट्रावस्कुलर लीथोट्रिप्सी (आईवीएल) एक नई टेक्नोलॉजी (Shock wave intravascular lithotripsy in hindi) है, जिसे भारत में हाल ही में लॉन्च किया गया था। दिल्ली का यह केस दूसरा मामला था, जहां इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया।

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Written By: Anshumala | Published : March 5, 2020 6:56 PM IST

80 वर्षीय मरीज को गंभीर एंजिना की बीमारी के साथ उसकी एलएडी कोरोनरी आर्टरी में 90% ब्लॉकेज की समस्या थी। मरीज की गंभीर हालत को देखते हुए उसे नई दिल्ली में वसंत कुंज स्थित सरोज कार्डिएक साइंसेस इंडियन स्पाइनल इंजरी सेंटर में भर्ती किया गया। अस्पताल में एडवांस शॉकवेव इंट्रावस्कुलर लीथोट्रिप्सी (आईवीएल) ट्रीटमेंट (Shock wave intravascular lithotripsy) की मदद से मरीज का सफल इलाज किया गया। शॉकवेव इंट्रावस्कुलर लीथोट्रिप्सी (आईवीएल) एक नई टेक्नोलॉजी (Shock wave intravascular lithotripsy in hindi) है, जिसे भारत में हाल ही में लॉन्च किया गया था। दिल्ली का यह केस दूसरा मामला था, जहां इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया।

क्या है शॉकवेव इंट्रावस्कुलर लीथोट्रिप्सी टेक्नीक?

नई दिल्ली में वसंत कुंज स्थित सरोज कार्डिएक साइंसेस इंडियन स्पाइनल इंजरी सेंटर के कार्डियोलॉजी विभाग के निदेशक व हेड, डॉक्टर असीम ढल ने बताया, “शॉकवेव इंट्रावस्कुलर लीथोट्रिप्सी एक अनोखी तकनीक है, जो कैल्शियम की कड़ी परत को हटाने के लिए दिल की धमनियों में तेज रफ्तार वाली सोनिक प्रेशर वेव्स बनाती है। यह एक सफल और सुरक्षित इलाज है, जिसके परिणाम मरीज के जीवन को बेहतर बनाते हैं। इस मामले में, केवल 35 मिनट में इलाज पूरा हो गया और अगले दिन ही मरीज को अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया।”

शॉकवेव इंट्रावस्कुलर लिथोट्रिप्सी एक अनोखी प्रक्रिया है, जिसकी मदद से कोरोनरी आर्टरी डिजीज (coronary artery disease in hindi) के एडवांस चरण वाले मरीज का भी इलाज करना संभव हो पाता है, जिनकी धमनी में कैल्शियम इकठ्ठा होने के कारण हार्ड ब्लॉकेज बन जाता है। ऐसी स्थिति ज्यादातर एंजियोप्लास्टी के 20-25 फीसदी मरीजों में खासतौर पर अधिक उम्र, डायबिटीज, कोरोनरी किडनी डिजीज आदि के कारण बनती है। हार्ट ब्लॉकेज को खोलने के लिए पुरानी तकनीकों में अल्ट्रा-हाई-प्रेशर बैलून या रोटेटरी ड्रिल शामिल हैं। इन तकनीकों का इस्तेमाल बेहद मुश्किल और जोखिम भरा होता है। वहीं शॉकवेव कोरोनरी लीथोट्रिप्सी एक एडवांस तकनीक है, जो हार्ड ब्लॉकेज को आसानी से खोल देती है।

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हालांकि, अल्ट्रा-हाई-प्रेशर बैलून और रोटेटरी ड्रिल जैसी तकनीकों का इस्तेमाल आज भी कुछ मामलों में भी किया जाता है लेकिन इनके इस्तेमाल में भारी खतरा होता है। इसमें रक्त वाहिकाओं के फटने या कटने का खतरा रहता है, जिससे मरीज की जान तक जा सकती है। इसके अलावा, ये तकनीकें कैल्शियम के हार्ड ब्लॉकेज के इलाज के लिए बिल्कुल भी उपयुक्त नहीं हैं।

डॉ. ढल ने आगे बताया, “धमनियों में कैल्शियम की परत की समस्या में पर्क्यूटेनिअस कोरोनरी इंटरवेंशन्स (पीसीआई) कार्डियोलॉजी के क्षेत्र का सबसे चुनौतीपूर्ण इंटरवेंशन बना हुआ है। इसमें बैलून और स्टेम को डालना बेहद मुश्किल हो जाता है जिससे कैल्शियम की परत आसानी से नहीं खुल पाती है और परिणाम भी अच्छे नहीं होते हैं।”

सरोज ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स के निदेशक डॉ. भारद्वाज ने बताया, “हम हमेशा बेहतरीन और एडवांस तकनीक लाने में विश्वास रखते हैं, जिससे इलाज के परिणाम और अधिक बेहतर हो सके। यह अनोखी तकनीक भी इनमें से एक है, जिसे हमारी कार्डियोलॉजिस्ट्स की टीम ने मरीजों के बेहतर इलाज के लिए चुना है। हमारे मरीजों का अनुभव हमारे लिए सबसे ज्यादा मायने रखता है और उनके अनुभव को बेहतर बनाने के लिए हम हर संभव कोशिश करते हैं।”

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