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अक्सर लोग अस्थमा (Asthma) और सीओपीडी (COPD) को एक ही बीमारी समझ लेते हैं, क्योंकि इन दोनों के ही लक्षण एक जैसे होते हैं। इन दोनों समस्याओं में कॉमन लक्षण जैसे खांसी, कफ और सांस लेने में दिक्कत शामिल हैं। लेकिन, ये दोनों ही रोग एक-दूसरे से बहुत अलग हैं। सीओपीडी को क्राॅनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (Chronic obstructive pulmonary disease) कहते हैं, जो अस्थमा से कहीं ज्यादा गंभीर बीमारी है। सीओपीडी (COPD Disease) दुनियाभर में बड़ी ही तेजी से लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है, इसलिए सीओपीडी (kya hai copd rog) के बारे में जानना बहुत जरूरी है।
क्राॅनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज फेफड़ों का एक ऐसा रोग (Lung Disease) है, जिसमें मरीज सामान्य रूप से सांस नहीं ले पाता। सामान्य तौर पर फेफड़े बहुत स्पॉन्जी होते हैं। जब हम सांस के जरिए हवा अंदर लेते हैं, तो ऑक्सिजन हमारे खून के अंदर मिल जाती है और कार्बन डाइऑक्साइड बाहर चली जाती है, लेकिन सीओपीडी रोग (kya hai copd rog) इस प्रक्रिया को रोकता है। सीओपीडी के मरीज को सांस लेने में परेशानी होती है और ऑक्सीजन उसके शरीर में पूरी मात्रा में नहीं पहुंच पाती है।
सीओपीडी रोग में मरीज को सांस लेने में परेशानी होना, गहरी सांस लेना, सांस लेने के लिए अपनी एक्सेसरीज मसल्स जैसे चेस्ट मसल्स और नेक का प्रयोग करना, कफ, खांसी, जुकाम, सीने में जकड़न, वजन कम होना, हार्ट की समस्याएं, फेफड़ों का कैंसर आदि लक्षण देखे जा सकते हैं। ये लक्षण लम्बे समय तक चलते हैं और समय के साथ-साथ मरीज की हालत भी बिगड़ती जाती है।
सीओपीडी रोग का एक सबसे बड़ा कारण है प्रदूषण। रोज सड़कों पर गाड़ियों से निकलने वाला धुंआ और उनसे निकलने वाली जहरीली गैसे सबसे ज्यादा खतरनाक है। गांव या कस्बों में लकड़ी और उपलों को चूल्हा जलाकर खाना पकाया जाता है। ये धुंआ भी उतना ही हानी पहुंचाता है। सिर्फ इतना ही नहीं, धूल, मिट्टी, डस्ट सांस के साथ शरीर के अंदर जाकर फेफड़ों को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं। इनके अलावा धूम्रपान करने की लत भी इस रोग को बढ़ाती है। कई लोग जो चेन स्मोकर होते हैं, बीड़ी या हुक्का पीते हैं, उनमें भी सीओपीडी होने के सम्भावनाएं बढ़ जाती हैं। स्मोकिंग करना, ड्रग्स लेना ये सभी सीओपीडी होने के कारणों में शामिल हैं।
क्या होता है सीओपीडी ? जानें कारण और बचाव
सीओपीडी बीमारी पहले सबसे ज्यादा चालीस वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों में होता था, पर अब इसका असर कम उम्र के बच्चों और युवकों में भी ज्यादा नजर आ रहा है। इनमें 2 साल या उससे बड़े बच्चे भी शामिल हैं। छोटे-छोटे बच्चे इस प्रदूषण को अक्सर नहीं झेल पाते हैं, इसलिए भी बहुत ही कम उम्र में उन्हें सांस लेने में परेशानी शुरू हो जाती है।
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इस रोग की वजह से मरीज के फेफड़े बहुत सख्त हो जाते हैं, जिस वजह से फेफड़ों में कई तरह की बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है। फेफड़ो में पस पड़ना या कैंसर होने का खतरा भी बढ़ जाता है, इसलिए इसका वक्त पर इलाज होना बहुत ही जरूरी है। प्रदूषण को एकदम से कम कर देना हमारे हाथ में नहीं है, पर धूम्रपान, तंबाकू और ड्रग्स का सेवन कम करके क्राॅनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज रोग के होने के खतरे को कम कर सकते हैं।
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