... Read More
By clicking “Accept All Cookies”, you agree to the storing of cookies on your device to enhance site navigation, analyze site usage, and assist in our marketing efforts. Cookie Policy.
Written By: Yogita Yadav | Updated : August 9, 2019 5:28 PM IST
आप ही बच्चों के रोल मॉडल हैं और आप ही उनके गाइड। इसलिए यह ध्यान रखें कि बच्चे के हित के लिए कहीं उससे दूरी न बढ़ा लें। पेरेंटिंग के पुराने तरीकों को बदलना होगा। © Shutterstock
हर बात पर जिद करना, झूठ बोलना, बहुत ज्यादा डिमांडिंग होना… इन दिनों ये खराब आदतें ज्यादातर बच्चों में आमतौर पर देखने को मिलती हैं। पर इसकी असल वजह वे नहीं, उनके आसपास का माहौल है। इसलिए जरूरी है कि बच्चों को अच्छी आदतें (Good habits) सिखाने के लिए पहले उनके आसपास ऐसा माहौल पैदा करें, जिनमें अच्छी आदतें (Good habits) दिखाई देती हों।
नोएडा की चाइल्ड काउंसलर विशेषज्ञ डॉ प्रियंका श्रीवास्तव कहती हैं, बच्चे बिल्कुल गीली मिट्टी की तरह होते हैं। उन्हें जैसा बनाएंगे वे वैसे ही बन जाएंगे। अकसर माता-पिता शिकायत करते हैं कि उनके बच्चे हर छोटी-छोटी बात पर झूठ बोलते हैं। वे जानना चाहते हैं कि इसकी वजह क्या है। इस पूरी कोशिश में वे अपने व्यवहार की तरफ बिल्कुल ध्यान नहीं देते।
3 से 7 साल की उम्र के बच्चे बड़े प्यारे-प्यारे झूठ बोलते हैं। असल में यह झूठ नहीं, वे बातें बनाना सीख रहे होते हैं। इस उम्र में भले ही आपको उन पर प्यार आए, लेकिन यह झूठ बोलने की आदत का प्रारंभिक स्तर है। इसे इसी समय रोकना (Good habits) बेहतर होगा। इस उम्र में वे सच और झूठ के बीच अंतर नहीं कर पाते हैं। वे अपनी कल्पनाओं को शब्दों में पिरोकर और उसे दूसरों को बताकर सच का रूप दे देते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि आपका बच्चा झूठ बोलने लग गया है। इसके लिए आपको उसका वास्तविकता से परिचय कराना होगा। उसकी मानने लायक इच्छाओं को पूरा करें और जो नही हो सकतीं उसके लिए उसकी समझ पैदा करवाएं।
छोटे बच्चों में भरपूर जिज्ञासा होती है। वे हर चीज के बारे में कई तरह के सवाल पूछते हैं। कई बार बच्चे ऐसे सवाल पूछ लेते हैं जिन्हें उनकी कच्ची उम्र समझा पाना बेहद मुशकिल होता है। ऐसे में कई बार पैरेंट्स बात को टालने के लिए कोई झूठी कहानी या बात बच्चे को बता देते है। इस तरह वे सच भले न जान पाएं, लेकिन झूठ बुनने की कला सीख जाते हैं। इसलिए जब भी बच्चे कोई सवाल पूछें उन्हें सही जवाब दें। उनकी उम्र से ज्यादा बड़े सवाल पर उन्हें इंतजार करना सिखाएं।
अक्सर बच्चे सज़ा के डर से झूठ बोलते हैं। इसके लिए ज़रूरी है कि बच्चों को बचपन से ही अपने विचार और अपने मन की बात कहने की स्वतंत्रता मिले। अगर बच्चे कुछ गलत चीज़ या बहुत महंगी चीज़ की मांग करते हैं तो उन्हें आपके मना करने का उचित कारण बताएं कि आपने ऐसा क्यों किया। बच्चे को कनविंस करें तब आगे से वह आपकी बात मानने लगेगा।
कई बार बच्चे दूसरों की नजर में अच्छा बनने के लिए काल्पनिक बातें करते हैं। बच्चों को यह विश्वास दिलाना जरूरी है कि आप उन पर विश्वास करते हैं। इसके साथ ही माता-पिता और शिक्षकों को अपने बरताव में पारदर्शिता रखनी ज़रूरी है। अगर आप अपने बच्चे से कोई प्रॉमिस करते हैं तो उसे ज़रूर निभाएं।
बच्चों के आपसे या औरों से झूठ बोलने के कई कारण हो सकते हैं। जब वे बड़े होने लगते हैं, स्कूल जाने लगते हैं तब वे अपने परिवार के सुरक्षित वातावरण से बाहर हो जाते हैं और ज्यादातर समय अपने दोस्तों के साथ बिताते हैं। इससे आपका बच्चा बहुत से दूसरें बच्चों व अलग-अलग प्रकार के लोगो से संपर्क में आता है जिससे उसके व्यवहार में कई परिवर्तन आते हैं, वो कुछ अच्छी चीज़े सीखता है तो कुछ बुरी भी। झूठ बोलना उसी में से एक है।
यदि माता-पिता खुद ही अक्सर झूठ बोलते हैं, तो वे कैसे अपने बच्चे से सच बोलने की उम्मीद कर सकते हैं कभी-कभी ऐसी सिचुएशन आ जाती है जब हमें झूठ बोलना पड़ जाता है, तब अपने बच्चे को बताएं कि आपने ऐसा क्यों किया। इससे बच्चा एक निश्चित व्यवहार करना सीखता है। आप उनके रोल मॉडल हैं, यह बात आपको कभी नहीं भूलनी चाहिए।
बच्चे की ईमानदारी और सच्चाई पर उसे शाबाशी दें, इससे उसे प्रोत्साहन मिलेगा। जब वे अपनी शैतानियों या गलती पर बताएं तो भी उन्हें धैर्य पूर्वक सुनें और समझाएं कि इसे करने से यह नुकसान हुआ या हो सकता है। इससे बच्चे सच बोलने की हिम्मत तो रखेंगे ही, साथ ही गलतियों से भी सबक सीखेंगे। इस तरह वे हर काम करने से पहले आपकी अनुमति लेंगे और हमेशा सच बोलेंगे क्योंकि वे आपसे डरते नहीं हैं बल्कि आप पर विश्वास करते हैं और जानते हैं कि आप सब ठीक कर देंगे।
आप ही बच्चों के रोल मॉडल हैं और आप ही उनके गाइड। इसलिए यह ध्यान रखें कि बच्चे के हित के लिए कहीं उससे दूरी न बढ़ा लें। पेरेंटिंग के पुराने तरीकों को बदलना होगा। पहले माता-पिता बच्चों से बहुत सख्त व्यवहार करते थे। परंतु अब आपको उनका दोस्त बनना होगा। मारने-पीटने से तो बिल्कुल बचना होगा। इससे बच्चा सुधरता नहीं है, बल्कि आपसे दूरी बनाने लगता है। बच्चे को अनुशासन के साथ-साथ भावनात्मक सबक सिखाने की भी यही उम्र होती है।
#WBW 2019: वर्किंग मदर्स के लिए खास हैं ये ब्रेस्टफीडिंग उत्पाद