आपके बिजी होने से बच्‍चों में बढ़ रही है यह समस्‍या

शहरी मध्‍यमवर्गीय परिवारों के ज्‍यादातर बच्‍चे सायकोटिक डिप्रेशन के शिकार हो रहे हैं। इससे उन्‍हें बचाने के लिए आपको अपना टाइम मैनेजमेंट और फैमिली बॉन्डिंग पर ठीक से काम करने की जरूरत है।

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Written By: Yogita Yadav | Updated : August 16, 2019 10:33 AM IST

पढ़ाई में मन न लगना, खेल कूद में हिस्‍सा न लेना, हर बात पर झगड़ना, चिल्‍लाना और बात न मानना…. आप जिसे बच्‍चे का बिगड़ना समझ रहे हैं, असल में यह उसके बीमार (Psychotic depression) होने के संकेत हैं। टफ लाइफ की छोटी-छोटी बातों को अकेले हैंडल करते, ज्‍यादातर शहरी बच्‍चों में यह मानसिक विकार बढ़ रहा है। जिसे सायकोटिक डिप्रेशन (Psychotic depression) कहा जाता है। एकल परिवारों में पलने वाले वे बच्‍चे जिन्‍हें क्‍वालिटी टाइम नहीं मिल पाता, वे इस मानसिक अवसाद के शिकार हो रहे हैं।

क्‍या है सायकोटिक डिप्रेशन  (Psychotic depression)

सायकोटिक डिप्रेशन एक मेजर डिप्रेशन है जिसके अंदर आपको ऐसी भावनाएं या आवाज सुनाई दे सकती है कि आप किसी काम के नहीं हैं या असफल हैं। इस डिप्रेशन में कुछ लोगों को लग सकता है वह अपने विचारों को सुन सकते हैं।

सायकोटिक डिप्रेशन के लक्षण (Psychotic depression)

बच्चों में लगातार उदासी या मायूसी महसूस करें, तो तुरंत सतर्क हो जाएं। यह सायकोटिक डिसऑर्डर डिप्रेशन के लक्षण हो सकते हैं। चिड़चिड़ापन, बिना कारण दुखी रहना, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करना, व्यवहार में बदलाव, खाने-पीने में अरूचि, पढ़ाई, खेलकूद में मन नहीं लगना, नकारात्मक सोच और बैचेन रहना इसके लक्षण हैं। इसके अलावा अपने हम उम्र बच्‍चों से ईर्ष्‍या करना, स्कूल से शिकायतें आना और अकेलापन पसंद करना भी इसके प्रारंभिक लक्षण बताए जाते हैं।

क्‍या है वजह

आधुनिक जीवन शैली में अधिकतर बच्चे सायकोटिक डिप्रेशन के शिकार हो रहे हैं। बच्चों में सायकोटिक डिप्रेशन का कारण बच्चों का अकेलापन, बच्चों को समझने में गलती करना, अधिक डांट फटकार लगाना और बच्चों पर अपेक्षाओं का अ‍त्‍यधिक बोझ है। आजकल अधिकांश कपल वर्किंग हैं। वे सुबह ही अपने-अपने वर्कप्‍लेस के लिए निकल जाते हैं। ऐसे में बच्चे न सिर्फ घर पर अकेले रह जाते हैं, बल्कि उन पर अपनी और घर की सुरक्षा की जिम्‍मेदारी भी डाल दी जाती है।

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पढ़ाई का भी हो सकता है तनाव

कुछ बच्चों में तनाव का एक मुख्‍य कारण पढ़ाई भी है। जिसमें बच्चे समय पर सिलेबस को पूर्ण नहीं कर पाते हैं। होमवर्क पूरा न होने अथवा नंबर कम आने की चिंता भी उन्‍हें बनी रहती है। होमवर्क पूरा न होने पर माता-पिता से तो डांट पड़ती ही है, स्कूल में टीचर की फटकार भी सुननी पड़ती है।

हो सकते हैं गंभीर परिणाम

गुमसुम, उदासी और चिड़चिड़ेपन के ये लक्षण लंबे समय तक रहें, तो बच्‍चे पर इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इसके कारण बच्चे नकारात्मक सोच की ओर बढ़ने लगते हैं। इससे उनका कॉन्‍फीडेंस लेवल भी कम होता जाता है और पढ़ाई हो या खेलकूद सभी जगह उनकी परफॉर्मेंस प्रभावित होने लगती है।

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 सायकोटिक डिप्रेशन से बचाव 

अगर बच्‍चों में इस तरह के लक्षण महसूस हों तो तुरंत सतर्क हो जाएं। सिलेबस और पढा़ई का इतना दबाव न बनाएं कि उनकी उम्र की उमंग और मस्‍ती ही खत्‍म हो जाए। पढ़ाई के अलावा उनकी अभिरूचि के एक्टिविटी, खेलकूद में भी उन्‍हें शामिल करें। बच्‍चों को क्‍वालिटी टाइम दें। बच्चों की छोटी-छोटी बातों को नकारे नहीं। उन्‍हें ध्‍यान से सुनें और बेहतर के लिए गाइड करें। पति-पत्‍नी दोनों अपने घर और ऑफि‍स का शेड़यूल ऐसे बनाएं कि बच्‍चे के लिए ज्‍यादा से ज्‍यादा समय निकाल सकें। उन्‍हें सिर्फ महंगे खिलौनों,  बड़े स्‍कूल और आपके पैसे की ही नहीं, आपके प्‍यार, मार्गदर्शन और सपोर्ट की भी जरूरत है। अगर जरूरत पड़े तो किसी अच्‍छे चाइल्‍ड काउंसलर या मनोचिकित्‍सक की भी सलाह लें।

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