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Cardiovascular Diseases : इलाज की नई तकनीक बचाएगी आपको कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों से

अकेले भारत में ही 2015 में इससे दो मिलियन मौतें हुई, इनमें 1.3 मिलियन का आंकड़ा 30 से 63 वर्ष की आयु वर्ग के बीच के लोगों का है। ऐसे में जब विश्व इन बीमारियों से लड़ने के लिए संघर्ष कर रहा है, तब हाल ही में हुई तकनीकी क्रांति ने स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र को नए आयाम दिए हैं और बीमारियों को देखने और उनके निवारण को नई दृष्टि प्रदान की है।

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Written By: Anshumala | Updated : September 30, 2019 3:26 PM IST

नॉन कम्यूनिकेबल डिजीजेज लगातार चुनौतीपूर्ण तरीके से वैश्विक स्तर पर बढ़ रहे हैं। यूनाइटेड नेशंस की एक रिपोर्ट के अनुसार, कार्डियोवैस्क्यूलर डिजीजेज (Cardiovascular Diseases) मौतों का प्रमुख कारण है, खासकर निम्न एवं मध्यम आय वर्ग वाले देशों में। अकेले भारत में ही 2015 में इससे दो मिलियन मौतें हुई, इनमें 1.3 मिलियन का आंकड़ा 30 से 63 वर्ष की आयु वर्ग के बीच के लोगों का है। ऐसे में जब विश्व इन बीमारियों से लड़ने के लिए संघर्ष कर रहा है, तब हाल ही में हुई तकनीकी क्रांति ने स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र को नए आयाम दिए हैं और बीमारियों को देखने और उनके निवारण को नई दृष्टि प्रदान की है। कार्डियेक डिजीजेज (Cardiovascular Diseases) के निदान और पहचान को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है, जिनमें डाग्नोस्टिक, ड्रग्स और इन्वेसिव इन्टरवेंशंस शामिल हैं।

डाग्यनोस्टिक प्रोसीजर में तरक्की

अगत्सा की मेडिकल एडवाइजर प्रो. अन्बु पंडियन का कहना है कि कार्डियेक संबंधी बीमारियों (Cardiovascular Diseases) में समय पर पता लगाना महत्वपूर्ण होता है। वर्ष 1990 तक दिल में किसी भी प्रकार की रुकावट एवं परेशानी का पता लगाने के लिए कार्डियोलॉजिस्ट केवल साधारण ईसीजी और एंजियोग्राफी पर निर्भर रहते थे। तनाव परीक्षण, कम्प्यूटरीकृत टोमोग्राफी, कार्डियेक एमआरआई और आधुनिक ईको ने कार्डियोवैस्कुलर साइंस को देखने के नजरिए में क्रांतिकारी बदलाव किए हैं। इन्ट्रावैस्कुलर कॉरेनरी अल्ट्रासाउंड, ऑप्टिकल कोहेरेंस टोमोग्राफी और इलेक्ट्रॉन बीम कम्प्यूटराइज्ड टोमोग्राफी ने कार्डियोवैस्कुलर निदान को नई ऊंचाइयां दी हैं।

थ्री डी इलेक्ट्रोफिजियोलॉजिक मैपिंग और फंक्शनल फ्लो रिजर्व तकनीक ने कार्डियेक एरेथिमा और एथ्रेस्कोलोरोसिस जैसी बीमारियों के प्रबंधन और समझ पर गहरा प्रभाव डाला है। बायोसेंसर्स और अन्य उपकरणों ने ना केवल परीक्षण प्रक्रिया को आसान बना दिया है, बल्कि परिणामों को सटीक और तेज गति में ला दिया है। उदाहरण के लिए हाईली स्पेशलाइज्ड माइक्रोचिप्स जैसी तकनीकों ने कई बीमारियों जिनमें सीवीडी भी शामिल है, मरीज के रक्त, स्लाईवा या यूरिन की एक बूंद से बेट्री टेस्ट का पता लगाने में सफलता हासिल की है।

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प्रिवेंटिंग ड्रग्स और ट्रीटमेंट

प्रो. अन्बु पंडियन आगे कहते हैं कि ह्यूमन जिनोम प्रोजेक्ट, बायोइन्फॉर्मेटिक्स और ड्रग डिजाइनिंग तीनों मिलकर कार्डियोवैस्कुलर साइंस की दवाओं के क्षैत्र में बेहतरीन बदलाव लेकर आए हैं। इन क्षैत्रों ने जानकारियों के एक क्षेत्र को खोल दिया है। इसने शोधकर्ताओं को ना सिर्फ कई बीमारियों के निदान के लिए नई दवाओं को बनाने में सक्षम बनाया है, बल्कि ड्रग रिस्पॉन्स और इसके प्रभाव पर नई समझ दी है। नई उपचार विधियों का उद्देश्य हार्ट डिजिज के उपचार के बेहतर परिणाम प्राप्त करना और समय पूर्व होने वाली मृत्यु को रेकना है।

कार्डियेक केयर की आधुनिक सर्जिकल प्रोसिजर

हाल ही तक हार्ट डिजिज के ज्यादातर मरीजों को ओपन हार्ट सर्जरी जैसी जोखिम भरी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था। कार्डियोवैस्कुलर सर्जरी में आधुनिकीकरण ने मरीज के जीवन को नई लीज प्रदान की है, उन्हें नई संभावनाओं से भरा है, यह परम्परागत एन्जियोप्लास्टि से बेहतर है। स्टेंट्स स्थायी मेटेलिक इम्प्लांट्स से ड्रग सोबल या घुलनशील के रूप में बदल गए हैं। नई वस्तुओं के आगमन ने कैथेटर को छोटा, लचीला और सटीक बना दिया है, कार्डियेक प्रोसिजर में इसका उपयोग आसान और व्यापक हुआ है।

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