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Written By: Anshumala | Published : August 14, 2019 4:56 PM IST
6 माह तक के बच्चों को स्तनपान कराने से न सिर्फ उन्हें बहुत सारे संक्रमणों, बीमारियों से सुरक्षा मिलती है, बल्कि कैंसर से भी उनका बचाव होता है। इतना ही नहीं, नियोनेटल आईसीयू (एनआईसीयू) में भर्ती नवजातों के लिए भी मां का दूध बेहद अहम होता है, क्योंकि इससे उन्हे जानलेवा एंटीबायोटिक-रेजिस्टेंस बैक्टीरिया के सम्पर्क में आने से बचाया जा सकता है। ऐसा कहना है कोलम्बिया एशिया हॉस्पिटल के डॉक्टर्स का।
रिसर्च यह बताते हैं कि जिन बच्चों को कम से कम पहले 6 माह तक मां का दूध मिला होता है, उनकी आंत में रेजिस्टेंस बैक्टीरिया की मात्रा उन शिशुओं के मुकाबले कम पाई जाती है, जिन्हें इससे कम समय के लिए मां का दूध मिला होता है अथवा मिला ही नहीं होता है। ऐसा भी देखा गया है कि यदि डिलिवरी के समय मां को एंटीबायोटिक ट्रीटमेंट दिया जाता है, तो उनके दूध में रेजिस्टेंस बैक्टीरिया की मात्रा बढ़ जाती है और दूध के जरिए वे इसे बच्चों की आंत तक भी पहुंचा सकती हैं।
कोलम्बिया एशिया हॉस्पिटल, गाजियाबाद की ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनोकोलॉजिस्ट डॉ. नीरा भान का कहना है कि “दुनिया भर के डॉक्टर 6 माह तक की आयु के बच्चों को सिर्फ मां का दूध पिलाने की सलाह देते हैं, क्योंकि इससे उन्हें बेहद आसानी से हजम हो जाने वाला प्रोटीन, शुगर और फैट मिलता है, जो नवजात बच्चों के विकास के लिए पूर्ण रूप से उपयुक्त होता है। ह्यूमन मिल्क ऑलिगोसैचराइड्स (एचएमओ) ढांचागत रूप से जटिल शुगर मॉलिक्यूल्स होते हैं, जो सिर्फ मानवीय दूध में ही पाया जाता है और लैक्टोज व फैट के बाद मां के दूध में यह सबसे अधिक पाया जाता है।
यह बच्चे की आंत में प्रीबायटिक की तरह काम करता है, जिससे गट माइक्रोबायोटा के पनपने में सहायता मिलती है, जो कि एलर्जिक बीमारियों का महत्वपूर्ण इंफ्लुएंसर होता है। जिन बच्चों को उनके जीवन के शुरुआती दिनों में मां का दूध मिला होता है, उन्हें कान में संक्रमण, निमोनिया, पेट के वायरस और डायरिया का खतरा कम होने के साथ-साथ लिम्फोमा और ल्युकीमिया, बाउल डिजीज जैसे कि क्रॉन्स, अस्थमा, एलर्जी, एग्जिमा, डायबिटीज, सडन इन्फैंट डेथ सिंड्रोम (एसआईडीएस) की चपेट में आने का खतरा भी कम रहता है। एनआईसीयू में भर्ती अधिकतर बच्चे अल्प विकसित होते हैं और उन्हें संक्रमण व बीमारियों का खतरा अधिक रहता है। मां का दूध मिलने से उनमें प्रतिरोध क्षमता तेजी से बढ़ती है, जिससे उन्हें एंटीबायोटिक-रेजिस्टेंस बैक्टीरिया, जिसे सुपरबग के नाम से भी जानते हैं का खतरा भी कम रहता है।
डॉ. भान आगे बताती हैं कि स्तनपान से मां को भी काफी लाभ होता है। इससे मां को स्तन अथवा गर्भाशय कैंसर का खतरा कम होता है, दिल की बीमारियों और ऑस्टियोपोरोसिस होने की आशंका कम रहती है, साथ ही इससे अतिरिक्त कैलोरी भी आसानी से बर्न हो पाती है। स्तनपान कराने वाली मां एक दिन में 1000 कैलोरी तक बर्न करती है। इससे पोर्सपार्टम हीलिंग की दर भी बढ़ती है और उनका गर्भाशय जल्दी से जल्दी प्रेग्नेंसी से पहले वाले आकार में आ जाता है।
मां के आहार का असर भी उसका दूध पी रहे बच्चे पर पड़ता है। हाई प्रोटीन भोजन जैसे कि साबुत अनाज, सीरियल्स, दालें, सूखे मेवे, सब्जियां, अंडे और चिकन आदि मां व नवजात शिशु दोनों के लिए अच्छा माना जाता है। मां को बहुत सारा पानी भी पीना चाहिए। ताजे फलों के जूस, नारियल पानी, लस्सी और नींबू पानी अधिक मात्रा में लेने से शरीर में नमी बरकरार रखी जा सकती है। साथ ही स्तनपान कराने वाली मां को अल्कोहल के इस्तेमाल से भी बचना चाहिए।
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