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Written By: Editorial Team | Updated : January 5, 2017 8:32 AM IST
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अनुवादक – Usman Khan
मस्से (Warts) शरीर की किसी भी हिस्से में हो सकते हैं। ये ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (एचपीवी) के कारण होते हैं। यह एक आम यौन संचारित संक्रमण है, जिससे अधिकतर लोग प्रभावित होते हैं। एचपीवी के लगभग 60 प्रकार हैं, इनमें से कुछ ही स्किन पर मस्सा का कारण बनते हैं। इसका कारण यह है कि एचपीवी वायरस की वजह से त्वचा की बाहरी परत में कई सारी कोशिकाओं का विकास हो जाता है। मस्से अधिकतर हाथ, पैर, पीठ, कलाई और घुटनों पर दिखाई देते हैं और इन्हें फ्लैट वॉर्ट (flat warts) कहा जाता है। एचपीवी कई बार जननांग मस्से (genital warts) का भी कारण बन जाता है। वास्तव में, एचपीवी वायरस की वजह से चार अलग अलग तरह के मस्से होते हैं। इस तरह के मस्से काफी दर्दनाक हो सकते हैं। फ्लैट वॉर्ट दिखने में आमतौर पर चपटे और शरीर के मांस के रंग के ही होते हैं। सबसे बुरी बात यह है कि यह विशाल समूहों में दिखाई दे सकते हैं। अगर ये अपने आप गायब नहीं होते, तो डॉक्टर लेजर ट्रीटमेंट और छोटी सर्जरी की सलाह दे सकते हैं। जिन्हें इलेक्ट्रिक निडल और टोपिकल ऑइंटमेंट के ज़रिये नष्ट किया जाता है। खैर, अगर आप किसी घरेलू उपाय से इससे छुटकारा पाना चाहते हैं तो, हम आपको एक आसान उपाय बता रहे हैं। और ये घरेलू उपाय है चांगेरी (Indian Sorrel) के छोटे-छोटे पत्ते। पढ़ें: तुलसी के सिर्फ 10 पत्ते चबाकर तनाव करें कंट्रोल!
चांगेरी के पत्ते ही क्यों
भारतीय शोधकर्ताओं के अनुसार, चांगेरी के पत्तों का मस्से दूर करने के लिए उपयोग किया जा सकता है। आपने इन पत्तों को घर के आँगन या पार्क में मानसून के दौरान उगते देखा होगा। इन पत्तों के एंटी फंगल, एंटी माइक्रोबियल, और वून्ड हीलिंग गुणों की वजह से इनका आयुर्वेद में कई बीमारियों के इलाज के लिए इस्तेमाल किया जाता है। चांगेरी के पत्तों में टेरटरिक (tartaric), सिट्रस एसिड (citrus acid) और विटामिन सी जैसे तत्व होते हैं। इसके पत्ते थोड़े कड़वे और मीठे होते हैं। पत्तों में कैरोटीन, कैल्शियम और ओक्सालेट्स (oxalates) भरपूर मात्रा में होते हैं। अगर आप गठिया और गाउट से संबंधित किसी भी बीमारी से ग्रस्त हैं, तो इसके पत्तों के उपयोग से बचें।
इसका इस्तेमाल ऐसे करें
चित्र स्रोत - Shutterstock
संदर्भ: Sekhar Namburi UR, Omprakash, Babu G. A review on management of warts in Ayurveda. Ayu. 2011;32(1):100-102. doi:10.4103/0974-8520.85739.