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Written By: Jitendra Gupta | Published : October 13, 2022 1:44 PM IST
बंद या ब्लॉक नसों (Thrombosis) को खोलने के लिए आयुर्वेदिक डॉक्टर ने बताई ये 3 थेरेपी! जानें आयुर्वेदिक थेरेपी
Therapy for Blocked veins : थ्रोम्बोसिस, जिसे आम भाषा में अगर कहा जाए तो नसों में बनने वाले क्लॉट भी कह सकते हैं। जब पैरों की सबसे आखिरी नस, जिसे डीप वेन भी कहते हैं उसमें रक्त के थक्के बनने लगे तो ये स्थिति पैदा होती है। ये स्थिति इसलिए भी घातक है क्योंकि आपकी नसों में बना खून का थक्का रक्त के प्रवाह में बहकर आपके दिमाग या फिर फेफड़ों में जा सकता है और स्ट्रोक व दूसरी गंभीर समस्याओं का कारण बन सकता है। दिल्ली स्थित ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद के डीन और एचओडी डॉ. महेश व्यास आपको ऐसे तरीकों के बारे में बता रहे हैं, जो नसों में खून का थक्का बनने से रोकने का काम करते हैं। आइए जानते हैं कौन से हैं ये तरीके।
डॉ. महेश व्यास के मुताबिक, किसी रक्त नलिका के अंदर खून के जमने पर एक प्रोटीन बन जाता है, जिसके परिणामस्वरूप रक्त का प्रवाह बाधित होने लग जाता है उसी को थ्रोम्बोसिस कहते हैं। जब कोई रक्त वहिका क्षतिग्रस्त हो जाती है, तो प्लेटलेट्स और फाइब्रॉएड मिलकर खून का थक्का बनाते हैं, जिससे रक्त का बहना बंद हो जाता है। जब व्यक्ति जीवित होता है तो रक्त वहिका स्वस्थ होती है और नसों में बहने वाला रक्त तरल होता है। लेकिन जब व्यक्ति किसी आघात, चोट या फिर दुर्घटना का शिकार हो जाता है तो चोटिल होने के दौरान बनने वाले खून के थक्के को भी थ्रोम्बोसिस कहते हैं।
1-शरीर में कोलेस्ट्रॉल बढ़ जाने के कारण
2-अनकंट्रोल्ड ब्लड शुगर लेवल बढ़ने से
3-मोटापा बढ़ने से
4-शराब, तंबाकू, गुटखा का अति सेवन
5-खून का गाढ़ा हो जाना
6-धूम्रपान करने से
7-सर्जरी की वजह से
8-हार्मोन रेगुलेटरी दवाएं, गर्भ निरोधक गोलियों का सेवन भी थ्रोम्बोसिस का कारण बनता है।
अधिक देर तक एक जगह पर बैठे रहना
बहुत ज्यादा देर तक लेटे रहना, यात्रा करना
कुर्सी पर ज्यादा देर बैठने से भी डीप वेन थ्रोम्बोसिस हो सकता है।
अनुवांशिक कारण
ये सभी स्थितियां रक्त के प्रवाह को बाधित करती हैं और थ्रोम्बोसिस की वजह बनती है।
डॉ. महेशा व्यास बताते हैं कि आयुर्वेद में किसी भी बीमारी की बात करें तो सबसे पहले उसके दोषों को जानकर उसका इलाज किया जाता है। आयुर्वेद की बात करें तो शरीर में क्लेद की वृद्धि की अवस्था है। आयुर्वेद में तीन दोष की बात कही गई है, जिसमें वात, पित्त और कफ दोष शामिल है। इन तीनों में से जब कफ की दुष्टि यानी असंतुलित हो जाता है तो दूषित कफ, धातु को दूषित करके शरीर की नसों में चिपक जाता है और रक्त के प्रवाह में बाधा पैदा करता है, जिससे थ्रोम्बोसिस की स्थिति पैदा होती है।
डॉ. महेशा व्यास कहते हैं कि इस स्थिति से बचने के लिए जिन कारणों से परेशानी होती है उन कारणों से बचें। अगर ये स्थिति पैदा हो गई है तो संशोधन और संशमन करें। संशोधम में पंचकर्म चिकित्सा शामिल है तो वहीं संशमन में औषधीय चिकित्सा के जरिए इस स्थिति का इलाज किया जाता है।
आयुर्वेद में संशवर्तन में वमन तकनीक सबसे बेहतर प्रक्रिया है, जो इस स्थिति में काम आती है। इसमें वमन की मदद से नसों में जमा थक्के को बाहर निकाला जाता है। अगर थक्का नसों में जमा हुआ है तो रक्त मोक्षण के जरिए भी उसे बाहर निकाला जा सकता है।
रक्त मोक्षण के जरिए दूषित रक्त को बाहर निकाला जाता है और
ब्लड क्लॉट को निकालने के लिए लीच थेरेपी का भी काफी यूज होता है। इसमें ब्लड सर्कुलेशन को बढ़ाने से रक्त के थक्के को तोड़ने का काम करते हैं। इसलिए इस प्रकार की क्लॉटिंग में ये थेरेपी भी काफी काम आती है। रक्त से जुड़ी कई परेशानियों में ये थेरेपी भी काम आती है।
इस थेरेपी के दौरान लीच का प्रयोग किया जाता है। लीच की लार में मौजूद तत्व रक्त के प्रवाह को बढ़ाने का काम करते हैं। इतना ही नहीं लीच की लार में मौजूद रसायनों से वेरिकोज वेन्ज की दवाएं भी बनाई जाती हैं। ये दवा थ्रोम्बोसिस को भी रोकने का काम करती है।
ये समस्या में अनेक अवस्था हो सकती है। व्यक्ति की समस्या कितनी गंभीर है और कितनी पुरानी है, उसका आहार-विहार कैसे है, इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए एक महीने से लेकर एक साल के भीतर इस परेशानी को दूर किया जा सकता है। हालांकि ये इस बात पर निर्भर करता है कि ब्लॉकेज कितना ज्यादा है। अगर ब्लॉकेज ज्यादा है तो ठीक होने में ज्यादा समय लग सकता है।
डॉ. महेश व्यास कहते हैं कि आर्टरी और वेन दोनों में से किसमें ज्यादा होता है तो इसका जवाब है कि आर्टरी के मुकाबले वेन में इसका ज्यादा खतरा होता है। जिस दिशा में रक्त का बहाव कम होता है, उस जगह थ्रोम्बोसिस का खतरा ज्यादा होता है।