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Written By: Atul Modi | Updated : July 14, 2021 9:11 PM IST
घर में जब बच्चे का जन्म होता है तो माता-पिता की खुशी का ठिकाना नही रह जाता है। इस ख़ुशी के मौके पर पूरा परिवार और यहां तक कि रिश्तेदार खुशियां मानते है । ऐसे में माता पिता बच्चे के बेहतर स्वास्थ्य के लिए और बीमारियों से बचाने के लिए कुछ प्राचीन संस्कार अपनाते हैं ताकि बच्चा निरोगी और बीमारियों से लड़ने में पूरी तरह से सक्षम रहे।
प्राचीन संस्कारो में से एक है स्वर्ण प्राशन (Suvarnaprashan) संस्कार, यह सनातन धर्म के 16 संस्कारों में से एक संस्कार है जो बच्चे के जन्म से लेकर 16 वर्ष की आयु तक कराया जाता है। स्वर्ण प्राशन संस्कार आयुर्वेद चिकित्सा की वह धरोहर है जो बच्चों में होने वाली मौसमी बीमरियों से रक्षा करता है। बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य में स्वर्णप्राशन की बहुत अच्छी भूमिका निभाता है।
स्वर्ण प्राशन संस्कार स्वर्ण (गोल्ड) के साथ शहद, ब्रह्माणी, अश्वगंधा, गिलोय, शंखपुष्पी, वचा आदि जड़ी बुटियों से निर्मित एक रसायन है। जिसका सेवन पुष्य नक्षत्र के दौरान किया जाता है। स्वर्णप्राशन संस्कार से बच्चों की शारीरिक एवं मानसिक गति में अच्छा सुधार होता है। यह बहुत ही प्रभावशाली और इम्युनिटी बूस्टर होता है, जो बच्चों में रोगों से लड़ने की क्षमता पैदा करता है।
स्वर्ण प्राशन संस्कार से विभिन्न रोगों से लड़ने की क्षमता बच्चों पैदा होती है। आयुर्वेद के क्षेत्र से जुड़े हमारे ऋषि मुनियों एवं आचार्यों ने हजारों वर्षों पूर्व वायरस और बैक्टीरिया जनित बीमारियों से लड़ने के लिए एक ऐसा रसायन का निर्माण किया जिसे स्वर्णप्राशन कहा जाता है। स्वर्ण प्राशन का अर्थ होता है स्वर्ण (सोना) का सेवन।
भारत के प्राचीन 16 संस्कारों में स्वर्ण संस्कार भी एक प्रमुख संस्कार है। हिन्दू परंपरा के अनुसार जब किसी बालक का जन्म होता है तो हिन्दू रीति-रिवाज के अनुसार नवजात शिशु को सोने या फिर चांदी की सली (सलाई) से बच्चे की जीभ पर शहद चटाने या फिर ऊँ लिखने की प्राचीन परंपरा है। मगर आज के समय में बहुत कम लोगों को इसकी जानकारी है। जो माता-पिता इस संस्कार का पालन पूरे नियम के अनुसार करते है तो उनके बच्चों में रोगों से लड़ने की क्षमता बेहतर होती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार प्रत्येक माह पुष्य नक्षत्र (Pushya Nakshatra) आता है और उसी नक्षत्र के दिन बच्चे को आयुर्वेदिक जड़ी बुटियों से निर्मित रसायन पान कराया जाता है। यह क्रम लगभग 12 से 14 महीनों तक लगातार चलता रहता है.
डॉक्टर चंचल शर्मा के अनुसार, जन्म से लेकर 16 वर्ष की आयु तक के सभी स्वस्थ और अस्वस्थ बच्चे स्वर्ण प्राशन का रस पान कर सकते है। बहुत से लोगों के मन में यह प्रश्न भी उठ सकता है कि क्या इसके कोई दुष्प्रणाम भी है क्या तो बता दें कि इसके एक भी दुष्प्रणाम नहीं है। यह पूरी तरीके से नेचुरल है और यह पूरी तरह से सुरक्षित है।
स्वर्ण धातु सभी धातुओं में सबसे श्रेष्ठ धातु मानी जाती है। स्वर्ण धातु शरीर के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण होती है। यह बच्चों के विकास तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता में बढ़ाने में सबसे अच्छा योगदान देती है। इन सभी कारणों से ही हजारों वर्षों के बाद भी आज स्वर्ण प्राशन का महत्व बना हुआ है। आयुर्वेद के महान ऋषियों का मत था कि कैसे भी मानव शरीर में स्वर्ण (गोल्ड) की आवश्यकता अनिवार्य है। स्वर्ण प्राशन संस्कार से बच्चे के मानसिक और बौद्धिक क्षमता का विकास होता है। इसके द्वारा बालक के शरीर, मन, बुद्धि और वाणी का उत्तम विकास होता है।
आयुर्वेद विज्ञान के अनुसार स्वर्ण प्राशन के कई लाभ है जो आपके बच्चे को स्वस्थ बनाने के साथ-साथ गुणकारी, तेजस्वी, ऊर्जावान और बलवान बनाने में मदद करते है।
(स्वर्ण प्राशन के संदर्भ में यह जानकारी आशा आयुर्वेदा की निःसंतानता विशेषज्ञ डॉ चंचल शर्मा से खास बातचीत के दौरान प्राप्त हुई है।)