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Written By: Jitendra Gupta | Published : March 10, 2022 5:05 PM IST
क्रोनिक किडनी रोगों से बचाने में कारगर हैं ये आयुर्वेदिक औषधियां, एक्सपर्ट से जानिए किन औषधियों से मिलता है फायदा
विश्व किडनी दिवस के मौके पर देशभर के एक्सपर्ट्स किडनी को हेल्दी रखने के तरीकों के बारे में लोगों को जागरूक कर रहे हैं। वहीं कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत में बरसों से प्रयोग में लाई जा रही आयुर्वेदिक दवा पुनर्नवा, गोखरू और वरुणा क्रोनिक किडनी रोग से जूझ रहे मरीजों के लिए बहुत फायदेमंद हो सकती है। क्रोनिक किडनी रोग एक ऐसी बीमारी है, जो इन दिनों विभिन्न कारणों से तेजी से बढ़ रही है।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में आयुर्वेदा फैकल्टी के डीन प्रोफेसर के.एन. द्विवेदी ने इन औषधियों की तारीफ करते हुए इन्हें किडनी रोगियों के लिए प्राण-रक्षक करार दिया क्योंकि ये सभी दवाइयां क्षतिग्रस्त गुर्दे की कोशिकाओंको फिर से ठीक करने में मदद करती हैं।
उन्होंने कहा कि नीरी-केएफटी एक ऐसी आयुर्वेदिक दवा है, जो पुनर्नवा, अश्वगंधा और गुडुची जैसे पौधों से बनी होती है और इनमें एंटी-ऑक्सीडेंट गुण भी होते हैं। उन्होंने बताया कि जैसा कि हम जानते हैं कि वरुणा जैसी मूत्रवर्धक औषधि एक बहुत ही अच्छी रक्तशोधक है, जो होम्योस्टेसिस को बरकरार रखने में मदद करती है। वहीं गोखरू किडनी के नेफ्रोन को फिर से ठीक करने में फायदेमंद मानी जाती है।
डॉ. द्विवेदी ने बताया कि इस तरह के फार्मूले बहुत से मरीजों में फायदेमंद साबित हुए हैं। उन्होंने कहा कि अगर समय रहते इस बीमारी का पता चल जाए तो इस बीमारी को ठीक किया जा सकता है और वो भी इन औषधियों की मदद से।
उन्होंने सख्त लहजे में कहा कि जितनी देरी इस रोग का पता लगाने में होगी उतनी ही देरी से मरीज को उपचार भी प्राप्त होगा। प्रोफेसर द्विवेदी का कहना है कि अगर शुरुआत में ही इस रोग का पता चल जाए तो किडनी को मजबूत बनाने वाले इस फार्मूले की मदद से डायलिसिस की प्रक्रिया और संभावना को कम किया जा सकता है।
द्विवेदी कहते हैं कि अगर शरुआती चरण में इस रोग के लिए इन दवाओं का इस्तेमाल किया जाए तो किडनी को क्षतिग्रस्त होने से बचाया जा सकता है। इन दवाओं के सेवन से क्रिटानाइन, यूरिया और यूरिक एसिड के लेवल को कम किया जा सकता है।
बता दें कि सीकेडी एक ऐसी गंभीर बीमारी है, जो वक्त के साथ-साथ बढ़ती चली जाती है, और धीरे-धीरे आपके गुर्दे काम करना बंद कर देते हैं। ये बीमारी आमतौर पर हृदय रोगों (हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट फेल्योर और स्ट्रोक) और डायबिटीज जैसी अन्य दूसरी गंभीर बीमारियों के साथ किडनी फेल्योर का कारण बनती है।
सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में कम से कम 15 फीसदी लोग सीकेडी से पीड़ित हैं। भारत में, यह आंकड़ा कुल जनसंख्या का लगभग 40 प्रतिशत है, जो डायबिटीज और ब्लड प्रेशर के साथ संकट को बढ़ा रहा है।
डॉक्टरों का कहना है कि कोविड के समय में इलाज एक चुनौती बन गया है और सीकेडी विश्व स्तर पर मौत के प्रमुख कारणों में से एक बन रहा है।