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Written By: Jitendra Gupta | Published : June 14, 2022 1:19 PM IST
आयुर्वेद और यूनानी में क्या अंतर है? जानिए दोनों में कैसे होता है बीमारी का इलाज
जड़ी-बूटियों और मिनरल्स से किसी बीमारी का इलाज हमारे ग्रंथों से लेकर वेदों में भी निहित है और बरसों से इन चिकित्सा पद्धति का उपयोग होता आ रहा है। आयुर्वेद और यूनानी दो ऐसे प्रमुख तरीके हैं, जिनमें इन प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल किया जाता है। बहुत से एलोपैथी दवाओं के दुष्प्रभावों से बचने के लिए इन चिकित्सा तरीकों की ओर रुख करते हैं। हालांकि अभी भी आयुर्वेद और यूनानी जैसी चिकित्सा तकनीक को लेकर जागरूकता की कमी है। यूं तो आयुर्वेद और यूनानी दोनों में ही देसी तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है लेकिन दोनों कई कारणों से बिल्कुल अलग-अलग हैं। आइए जानते हैं कैसे ये दोनों चिकित्सा पद्धति किसी व्यक्ति के शरीर पर अलग-अलग प्रभाव डालती हैं।
आयुर्वेद का मतलब है 'जीवन का विज्ञान' और दवा का एक ऐसा प्रकार है, जिसमें दवा के बजाए आपको उस रोग से उबरने के लिए एक पवित्र दृष्टिकोण अपनाना होता है। साधारण भाषा में कहें तो आयुर्वेद एक प्राकृतिक रास्ता है, जो कि वात, पित्त और कफ तीन दोषों के अध्ययन पर आधारित है। ये तीनों दोष ही किसी व्यक्ति की आयुर्वेदिक पर्सनैलिटी को निर्धारित करती हैं और शरीर में पंच तत्वों के मिश्रण को तय करती हैं। ये आपके शरीर को फिट रखने का काम करती हैं। अगर किसी व्यक्ति के शरीर में इन दोषों के बीच असंतुलन पाया जाता है तो आप बीमारियों के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं।
इन तीनों दोषों को संतुलित करने के लिए अलग-अलग तकनीक, नियम, डाइट और जड़ी-बूटियां का इस्तेमाल किया जाता है और ये आपको फिट बनाए रखने में मदद करती हैं।
ग्रीस देश से जन्मीं यूनानी चिकित्सा पद्धति प्राकृतिक दवाओं की एक शाखा है, जिसमें व्यक्ति को बिना बीमार पड़े संपूर्ण रूप से हेल्दी जीवन जीने की दिशा में तरीकों को सिखाने पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। ये ऐसी दवाओं का ढांचा है, जो सकरात्मक स्वास्थ्य को प्रोत्साहित और बीमारियों की रोकथाम करता है। ये हमारे शरीर में मौजूद ब्लैक बाइल, येलो बाइल, खून और बलगम जैसे चार मॉडल पर आधारित होता है।
दोनों ही तरीके प्राकृतिक सिद्धांतों पर आधारित हैं और इसलिए ये दोनों एक समान ही दिखाई देते हैं लेकिन दोनों कई मायनों में एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। इन दोनों के बीच सिर्फ एक ही समानता है कि इन दोनों उपचार तकनीकों के कोई साइड-इफेक्ट्स नहीं है। आइए जानते हैं इन दोनों के बीच कुछ खास अंतरः
आयुर्वेद की शुरुआत भारत में करीब 3 हजार साल पहले हुई थी। वहीं दूसरी तरफ यूनानी, मध्य पूर्व और पूर्वी एशिया से सामने आई हैं। ऐसा माना जाता है कि ये ग्रीस से शुरू हुई थी और उसके बाद तेजी से आगे की ओर बढ़ी। दोनों ही चिकित्सा पद्धति ने पूरे विश्व में अपनी पहचान बनाई है।
आयुर्वेद में वात, पित्त और कफ दोषों के असंतुलन पर ध्यान केंद्रित किया जाता है जबकि यूनानी में नब्ज, मल, पेशाब, जीभ, बोलने, देखने, स्पर्श और आप कैसे दिख रहे हैं जैसी चीजें शामिल होती हैं, जिनका निदान किया जाता है ताकि प्रभावी नतीजे प्राप्त हो सकें।
आयुर्वेद शरीर की शक्ति को बढ़ाने में मदद करती है और इसकी दवाओं में इस्तेमाल होने वाली जड़ी-बूटियों के इस्तेमाल से इम्यूनिटी भी बूस्ट होती है। ध्यान लगाना, थेरेपी, डाइट और सफाई की तकनीक इस चिकित्सा पद्धति का हिस्सा है।
वहीं यूनानी में अच्छे स्वास्थ्य के लिए दवाओं, डाइट में बदलाव, ड्रिंक्स और दूसरी चीजों पर ध्यान दिया जाता है। बीमारियों से दूर रहने के लिए आपको साफ हवा, पानी और ताजा खाना खाने की सलाह दी जाती है। इस पद्धति में आपको प्लांट बेस्ड प्रोडक्ट और नहाना, एक्सरसाइज जैसी चीजों पर ध्यान देना होता है।