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आयुर्वेद विशेषज्ञ ने बताया वात, पित्त व कफ क्या होते हैं और इन्हें संतुलित कैसे रखा जा सकता है।

आयुर्वेद के अनुसार अगर हम हमारे शरीर के वात, कफ और पित्त को समझ जाते हैं, तो कई बीमारियां होने का खतरा भी काफी हद तक कम हो जाता है। इस लेख में आयुर्वेद के चिकित्सक से इस बारे में कुछ जरूरी जानकारियां लेंगे।

Written By Mukesh Sharma
Updated : June 13, 2026 4:34 PM IST

ayurveda vat kaf pit (AI generated image)

दुनिया की सबसे प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों में आयुर्वेद का नाम सबसे पहले आता है और माना जाता है कि आज जब दुनिया ने स्वास्थ्य के बारे में ठीक से जाना भी नहीं था जब आयुर्वेद में समस्याओं का इलाज भी ढूंढना शुरु कर दिया था और आज भी स्वास्थ्य से जुड़ी बहुत सी समस्याएं हैं जिनका इलाज करने के लिए आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति पर ही भरोसा किया जाता है। आपने भी अक्सर जरूर सुना होगा कि आयुर्वेद में वात, पित्त और कफ के बारे में काफी बात की जाती है। लेकिन इन चीजों के बारे में ज्यादातर लोगों को जानकारी नहीं होती है, बल्कि आयुर्वद के अनुसार वात, कफ और पित्त बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि आयुर्वेद की चिकित्सा प्रणाली इसी के आधार पर काम करती है। चलिए आयुर्वेद व पंचकर्म विशेषज्ञ डॉक्टर हिमांशु सिंह से इस लेख में वात, कफ और पित्त के बारे में जानते हैं।

पहले जानें वात, कफ व पित्त होता क्या है?

आयुर्वेद के अनुसार हमारा शरीर तीन अलग-अलग प्राकृतिक ऊर्जाओं या दोषों से बना होता है, जिन्हें वात, कफ और पित्त के नाम से जाना जाता है। वात का मतलब होता है वायु व आकाश, पित्त का मतलब होता है अग्नि व जल और पित्त का मतलब होता है पृथ्वी व जल। स्वास्थ्य को हेल्दी रखने के लिए इनका बैलेंस सही होना बेहद जरूरी है क्योंकि ये तीनों दोष संतुलन में रहते हैं, तो व्यक्ति पूर्ण रूप से स्वस्थ रहता है। इसके विपरीत अगर इनका संतुलन बिगड़ने लगता है, तो अलग-अलग बीमारियां जन्म लेने लगती हैं। आयुर्वेद में इन दोषों को संतुलित रखने के लिए दिनचर्या, आहार और योग का होना बहुत ही जरूरी है।

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आयुर्वेद के अनुसार क्या होनी चाहिए दिनचर्या

आयुर्वेद के अनुसार एक सही दिनचर्या का मतलब यह है कि अपने शरीर के चक्र को प्रकृति के चक्र के साथ मिला कर चल रहे हैं और उसके लिए निम्न बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है -

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  • सूर्योदय से पहले उठना - आयुर्वेद के अनुसार एक अच्छी जीवनशैली को बनाए रखने के लिए रोजाना सूर्योदय से कम से कम डेढ़ से दो घंटे पहले उठना चाहिए। इस समय वातावरण में शुद्ध ऑक्सीजन होती है और वात दोष का प्रभाव होता है, जो शरीर से मल-मूत्र त्यागने में मदद करता है।
  • बासी मुंह पानी पीना - आयुर्वेद में इस क्रिया को उषापान कहा जाता है। सुबह उठते ही बासी मुंह 1-2 गिलास हल्का गुनगुना पानी पिएं (अगर पानी तांबे के बर्तन में रखा और अच्छा है)। यह शरीर से विषाक्त पदार्थों (Toxins) को बाहर निकालता है और कफ को पिघलाता है।
  • शौच और मुख-शुद्धि - शौचालय का इस्तेमाल करने के बाद दातून (नीम, बबूल) से दांत साफ करें। जीभ को साफ करना बहुत जरूरी है, क्योंकि यह पाचन तंत्र की गंदगी को दूर करता है।
  • तेल मालिश - आयुर्वेद में इसे अभ्यंग कहा जाता है, जिसमें स्नान से पहले शरीर पर हल्के गुनगुने तेल (तिल, सरसों या नारियल) से मालिश की जाती है। यह विशेष रूप से वात दोष को शांत करता है, त्वचा को निखारता है और रक्त संचार बढ़ाता है।
  • स्नान - आयुर्वेद मानता है कि हमेशा ताजे या मौसम के अनुकूल पानी से ही नहाना चाहिए। सिर पर बहुत अधिक गर्म पानी का प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि यह पित्त को बढ़ा सकता है।​

आयुर्वेद के अनुसार सही खान-पान

आयुर्वेद में एक कहावत है "जैसा अन्न, वैसा मन" जिसका मतलब हुआ कि आप जैसा खाना खाओगे आपका मन भी ऐसा ही रहेगा। इसलिए आयुर्वेद में भोजन के लेकर कुछ खास नियम होते हैं।

  • भूख लगने पर ही खाएं - बिना भूख के भोजन करने से 'आम' (विषाक्त पदार्थ) बनता है, जो तीनों दोषों को बिगाड़ता है।
  • गर्म और ताजा खाएं - रखा हुआ या बासी भोजन वात और कफ को बढ़ाता है और न ही बहुत ज्यादा गर्म या ठंडा खाना चाहिए।
  • पानी पीने का नियम - भोजन के ठीक पहले या तुरंत बाद ढेर सारा पानी न पिएं, इससे पाचन अग्नि शांत हो जाती है। भोजन के 40 मिनट बाद ही पानी पिएं।
  • षडरस भोजन - भोजन में छह रस शामिल करें यानी अलग-अलग प्रकार के स्वाद जैसे मीठा, खट्टा, नमकीन, तीखा, कड़वा और कसैला जरूर शामिल करें।

डिसक्लेमर: इस लेख का उद्देश्य केवल वात, कफ और पित्त दोष से जुड़ी सही जानकारी देना है और इसमें दी गई किसी भी जानकारी का इस्तेमाल किसी भी बीमारी के इलाज के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। इसके लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।