
आशु कुमार दास
आशु कुमार दास एक अनुभवी हेल्थ कंटेंट स्पेशलिस्ट हैं। इन्हें हेल्थ कंटेंट राइटर के तौर पर काम करते हुए 6 ... Read More
Written By: Ashu Kumar Das | Updated : May 5, 2026 8:02 AM IST
Medically Verified By: Dr. Chetan Sharma
Image credits by: अस्थमा एक गंभीर लेकिन आसानी से कंट्रोल की जाने वाली बीमारी है। (AI Generated image)
भारत में प्रदूषण के कारण अस्थमा के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अस्थमा को कई लोग सांस की बीमारी भी कहते हैं। हमारे देश अस्थमा के इलाज की बात आती है तो अक्सर लोग एलोपैथी दवाओं की ओर जाते हैं। एलोपैथी में दवाओं के साथ- साथ इनहेलर से भी अस्थमा को मैनेज किया जाता है। वहीं, जब बात आयुर्वेद में अस्थमा के इलाज की आती है, तो इसे जड़ से ठीक करने पर जोर दिया जाता है। फरीदाबाद के सेक्टर 8 स्थित सर्वोदय अस्पताल के आयुर्वेद कंसलटेंट डॉ. चेतन शर्मा का कहना है कि अस्थमा को आयुर्वेद में “तमक श्वास” कहा जाता है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति को सांस लेने और छोड़ने में कठिनाई होती है।कई बार लोग इसे सामान्य खांसी या एलर्जी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन समय रहते ध्यान न दिया जाए तो यह गंभीर रूप ले सकता है। आयुर्वेद में अस्थमा को वात, पित्त और कफ द्वारा संतुलित किया जाता है।
डॉ. चेतन शर्मा के अनुसार, आयुर्वेद में अस्थमा को मुख्य रूप से कफ और वात दोष के असंतुलन के कारण होने वाली बीमारी माना जाता है। आयुर्वेद मानता है कि जब किसी व्यक्ति में कफ दोष बढ़ता है तो श्वसन नलिकाओं में बलगम जमा हो जाता है इससे शरीर का वात दोष बढ़ने लगता है। वात दोष के कारण सांस लेने में रुकावट और घरघराहट महसूस हो जाती है। जब ये दोनों दोष असंतुलित हो जाते हैं, तब व्यक्ति को बार-बार सांस फूलने की समस्या होती है। इसे एलोपैथिक की मेडिकल भाषा में अस्थमा कहा जाता है।
अगर आपको या आपके आसपास किसी व्यक्ति को नीचे दिए गए लक्षण दिखाई दें, तो यह अस्थमा का संकेत हो सकता है:
अस्थमा का इलाज करना जरूरी है।
आयुर्वेद के अनुसार अस्थमा के कई कारण हो सकते हैं:
आयुर्वेदिक डॉक्टर का कहना है कि आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में अस्थमा का इलाज केवल दवा तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसमें शरीर को शुद्ध करने और संतुलन बनाने की प्रक्रिया शामिल होती है। अस्थमा के इलाज में सबसे महत्वपूर्ण होती है पंचकर्म थेरेपी। इसमें शरीर से विषैले तत्व (टॉक्सिन्स) बाहर निकाले जाते हैं।
आयुर्वेद में बॉडी को अंदर से साफ करने के लिए सबसे पहले वमन प्रक्रिया को अपनाया जाता है। इसमें मुख्य रूप से उल्टी करवाई जाती है। वमन शरीर से अतिरिक्त कफ निकालने में मदद करती है। इससे अस्थमा के मरीजों के लिए बहुत प्रभावी मानी जाती है।
विरेचन की प्रक्रिया भी आतंरिक सफाई के लिए अपनाई जाती है। इसमें मल द्वार से शरीर की गंदगी को बाहर निकाला जाता है। विरेचन प्रक्रिया को अपनाने से शरीर का पित्त और कफ दोष संतुलित होता है।
इस प्रक्रिया में नाक के जरिए औषधि दी जाती है। इससे श्वसन तंत्र को साफ करने में मदद मिलती है। अस्थमा के रोगियों का इलाज करने के लिए नस्य इसलिए किया जाता है, ताकि श्वसन तंत्र से बलगम को पूरी तरह से निकाला जा सके।
आयुर्वेद में कई ऐसी जड़ी-बूटियां हैं जो अस्थमा के लक्षणों को कम करने और फेफड़ों को मजबूत बनाने में मदद करती हैं।
अस्थमा लंबे समय में गंभीर हो सकता है।
डॉ. चेतन का कहना है कि अस्थमा जैसी सांस से जुड़ी बीमारी का इलाज आयुर्वेद में धीरे- धीरे काफी किया जाता है, लेकिन इसका असर लंबे समय तक रहता है। अगर किसी व्यक्ति में अस्थमा के लक्षण हल्के हैं तो इलाज 1 से 3 महीने में पूरा होता है। जबकि गंभीर अस्थमा के मरीजों का इलाज करने में 6 महीने या उससे ज्यादा का समय लग सकता है।
Disclaimer: अस्थमा एक गंभीर लेकिन आसानी से कंट्रोल की जाने वाली बीमारी है। एलोपैथी में अस्थमा का इलाज दवा और इनहेलर से किया जाता है। वहीं, आयुर्वेद में अस्थमा को पंचकर्म थेरेपी और विभिन्न प्रकार की जड़ी- बूटियों से ठीक किया जाता है। अगर सही समय पर पंचकर्म, जड़ी-बूटियों और सही जीवन शैली को अपनाया जाए, तो अस्थमा के मरीज एक आम हेल्दी जीवन जी सकते हैं। अगर आपको या आपके परिवार में किसी व्यक्ति को अस्थमा है तो एक बार आयुर्वेद के जरिए इसका इलाज अपनाने की कोशिश करें। ध्यान रहे कि आयुर्वेद में किसी भी बीमारी का इलाज करवाते समय दवा का कोर्स और इलाज की अवधि का पूरा होना बहुत जरूरी है।
Disclaimer: The content on TheHealthSite.com is only for informational purposes. It is not at all professional medical advice. Always consult your doctor or a healthcare specialist for any questions regarding your health or a medical condition.