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Written By: akhilesh dwivedi | Updated : October 2, 2019 5:07 PM IST
भारतीय समाज में आटिज्म और मंदबुद्धि बालक की पहचान में कई बार गलतियां होती है। सामान्य तरीके से देखने पर मंदबुद्धि और आटिज्म में कोई विशेष अंतर समझ में नहीं आता है। आज का दौर वो दौर है जब किसी भी चीज के बारे में तुरंत बोलना होता है, जबकि मंदबुद्धि या आटिज्म के शिकार बालक बहुत देर में प्रतिक्रिया देते हैं या नहीं देते हैं। आटिज्म के इलाज को लेकर भारत के ग्रामिण इलाकों में अभी कुछ खास जागरुकता नहीं है। शहरों में तो आटिज्म के प्रति लोगों की जागरूकता बढ़ी है। आटिज्म की बीमारी का सफल इलाज भी संभव रहा है। मंदबुद्धि और आटिज्म को समझने के लिए हमें दोनों चीजों के बारे में जानना होगा।
भारत सहित विश्व के कई बड़े अभिनेता अपने बचपन में आटिज्म के शिकार रहे हैं। अब सवाल ये उठता है कि आटिज्म और मंदबुद्धि बालक की पहचान कैसे की जाए ? आइए जानते हैं आटिज्म और मंदबुद्धि के बीच मुख्य अंतर के बारे में ......
किसी भी विषय वस्तु या बात को धीरे समझना, किसी के पुकारने पर कोई प्रतिक्रिया न देना, अपने घर-परिवार में अलग-अलग रहना, रफ्तार, दिशा और ऊंचाई के बारे में अनुमान लगाने में गलती करना, अपने आप में ही खोये रहना जैसे लक्षण आटिज्म के माने जाते हैं।
भारत में मानसिक स्वास्थ्य विधेयक के अनुसार आटिज्म भी मंदबुद्धि श्रेणी में आता है। मंदबुद्धि बालक एक तरह से इंटलेक्चुअल डिसएबेलिटी का शिकार होता है जबकि आटिज्म की बीमारी बिल्कुल अलग है। आटिज्म के शिकार बालक को इस विकार से बाहर निकाला जा सकता है जबकि मंदबुद्धि बालक को इस परेशानी से वापस सही करना मुश्किल काम है। मंदबुद्धि बालक एक तरह से मानसिक विकलांगता का शिकार होता है। इसकी जगह अगर आटिज्म को देखें तो ये एक तरह का विकार है जो अभिभावक, शिक्षक और एक्सपर्ट्स की मदद से ठीक किया जा सकता है।
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भारत में आटिज्म को लेकर बहुत ज्यादा जागरूकता न होने की वजह से बहुत से लोग इस विकार के पूरे जीवनकाल तक शिकार रहते हैं। एक अनुमान के अनुसार देश में 1.5 करोड़ से ज्यादा बच्चे आटिज्म के शिकार हो सकते हैं। आटिज्म को आटिज्म स्पेक्ट्रम डिसआर्डर के नाम से भी जाना जाता है। आटिज्म मुख्यतः तीन स्तर का होता है। आटिज्म को लेकर भारत में हाल के वर्षों में जागरूकता बढ़ी है।
आटिज्म के बारे में एक्सपर्ट्स भी मानते हैं कि इसे पूरी तरह से ठीक नहीं किया जा सकता लेकिन उचित मार्गदर्शन और सही दिशा में किया गया प्रयास आटिज्म के रोगी को बहुत हद तक ठीक कर सकता है। आटिज्म का इलाज भी भारत की सामान्य आबादी के हिसाब से देखा जाय तो बहुत मंहगा है।
आटिज्म को लेकर एक बात और सामने आती है कि बढ़ते प्रदूषण की वजह से भी गर्भ में पल रहे बच्चे के दिमागी विकास पर असर पड़ रहा है। कई बार तो यह भी पाया गया है कि धूम्रपान करने वाली महिला के बच्चे इस विकार के शिकार हो जाते हैं।
जब हम मंदबुद्धि और आटिज्म के बारे में जान चुके हैं तो अपने आस पास के बच्चों में इनके लक्षणों को आसानी से पहचान सकते हैं. अगर मंदबुद्धि और आटिज्म के अंतर को नहीं समझ पाते हैं तो एक बच्चे का जीवन बर्बाद हो जाता है.
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