रेटिनल डिटैचमेंट का मतलब है रेटिना आंख के पिछले हिस्से से दूर हट जाना। रेटिना एक प्रकार का संवेदनशील ऊतक है, जो रॉड्स एंड कॉन्स नामक तंत्रिका कोशिकाओं बना होता है। रेटिना आंख के पिछले हिस्से में मौजूद होता है और आंख की सबसे अंदरूनी सतह होती है। रेटिना की तंत्रिका कोशिकाएं रोशनी, आकृति और रंगों की पहचान करती है और इसके संकेत मस्तिष्क तक पहुंचाती हैं। इस प्रक्रिया की मदद से ही मस्तिष्क पता लगाता है कि आंखें क्या देख रही हैं। जैली जैसा एक खास पदार्थ रेटिन का सुरक्षा प्रदान करता है, जिसे विट्रियस (Vitreous) के नाम से जाना जाता है। रेटिना अलग होना अचानक से होने वाली एक समस्या है, जिसके बाद रेटिना सामान्य रूप से काम नहीं कर पाता है। रेटिनल डिटैचमेंट के बाद धुंधला दिखाना या फिर पूरी तरह से अंधापन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। रेटिना अलग होना एक गंभीर समस्या है और अगर इसका समय पर इलाज न किया जाए आंख में स्थायी क्षति हो सकती है। अगर आपको रेटिना अलग होने से संबंधित कोई भी लक्षण महसूस हो रहा है, तो जल्द से जल्द डॉक्टर से संपर्क कर लेना चाहिए।
रेटिना अलग होने के प्रकार
रेटिनल डिटैचमेंट के मुख्य रूप से तीन प्रकार हैं, जिनमें निम्न शामिल हैं -
रिग्मेटोजीनियस रेटिनल डिटैचमेंट - यह सबसे आम प्रकार का रेटिनल डिटैचमेंट है, जो आमतौर पर रेटिना के सतह क्षतिग्रस्त होने के कारण होता है।
ट्रैक्शनल रेटिनल डिटैचमेंट - रेटिनल डिटैचमेंट का यह प्रकार आमतौर पर स्कार टिश्यू बनने के कारण होता है। ट्रैक्शनल रेटिनल डिटैचमेंट में छिद्र या दरारें नहीं बनती हैं।
एक्सुडेटिव रेटिनल डिटैचमेंट - जब रेटिना के पीछे द्रव जमा होने लग जाता है, तो एक्जुडेटिव रेटिनल डिटैचमेंट हो जाता है।
रेटिना अलग होने के लक्षण
रेटिना अलग होने के प्रमुख लक्षणों में निम्न शामिल है -
अचानक से हुई रोशन से चमक का अनुभव होना (कुछ लोगों को रोशनी के बाद सितारे दिखने लगते हैं)
एक ही बार में कई फ्लोटर (Floaters) दिखाई देना, जो रेखाएं, आकृतियां और धब्बों जैसे दिखाई देते हैं।
दृष्टि का कुछ हिस्सा काला दिखाई देना
दृष्टि में ग्रे रंग के धब्बे दिखाई देना
अचानक से दृष्टि धुंधली पड़ जाना
डॉक्टर को कब दिखाएं?
रेटिनल डिटैचमेंट एक गंभीर समस्या हो सकती है और इसकी समय पर देखभाल न करने पर व्यक्ति की आंख की रोशनी स्थायी रूप से खत्म हो सकती है। इसलिए जल्द से जल्द इसकी जांच कराना बेहद जरूरी होता है। अगर आपको उपरोक्त में से कोई भी लक्षण महसूस हो रहा है, तो आपको जल्द से जल्द डॉक्टर से संपर्क कर लेना चाहिए।
रेटिना अलग होने के कारण
रेटिनल डिटैचमेंट के प्रकारों के अनुसार उसके कारण भी अलग-अलग होते हैं, जो इस प्रकार हैं -
रिग्मेटोजीनियस रेटिनल डिटैचमेंट - उम्र बढ़ने के साथ-साथ विट्रियस जेल संकुचित होने लगता है और इस कारण से रिग्मेटोजीनियस रेटिनल डिटैचमेंट की समस्या होती है। संकुचन के दबाव के कारण विट्रियस जेल रेटिन के कमजोर हिस्से में छिद्र या दरार बना देता है। विट्रियस जेल इस छिद्र या दरार के माध्यम से निकल जाता है और रेटिना में जमा होने लगता है। इस स्थिति के कारण रेटिना आंख के पिछले हिस्से से उठकर अलग हो जाता है।
ट्रैक्शनल रेटिनल डिटैचमेंट - आंख के अंदर स्कार ऊतक बनने के कारण भी रेटिना अलग हो जाता है, इस प्रक्रिया को ट्रैक्शन कहा जाता है और इसलिए इसका नाम ट्रैक्शनल रेटिनल डिटैचमेंट पड़ा। ट्रैक्शनल रेटिनल डिटैचमेंट का सबसे प्रमुख कारण डायबिटीज है, जिसमें धीरे-धीरे आंख में मौजूद रक्त वाहिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और स्कार ऊतक बनने लगते हैं।
एक्सुडेटिव रेटिनल डिटैचमेंट - रेटिना के अंदर द्रव जमा होना एक्सुडेटिव रेटिनल डिटैचमेंट का सबसे मुख्य कारण है। द्रव जमा होने के कारण आंख में दबाव बढ़ जाता है और यह रेटिना का आंख के पिछले हिस्से से धकेलने लगता है। आंख के पिछले हिस्से में सूजन होना या फिर रक्त वाहिका में रिसाव होना ही आंख में द्रव जमा होने का मुख्य कारण है। आंख में चोट लगना, ट्यूमर होना और आंख संबंधी कई ऐसी समस्याएं हैं, जिनके कारण रक्त वाहिका क्षतिग्रस्त हो जाती है और उसमें से रिसाव होने लगता है।
रेटिना अलग होने के जोखिम कारक
निम्न कुछ स्थितियां हैं, जो रेटिना अलग होने के खतरे को बढ़ा सकती हैं -
ग्लूकोमा, मोतियाबिंद या अन्य किसी समस्या के लिए आंख की सर्जरी हुई होना
ग्लूकोमा के लिए दवाएं लेना जो पुतली के आकार को छोटा बनाती हैं
आंख में गंभीर चोट लगी होना
दूसरी आंख में पहले से ही रेटिनल डिटैचमेंट हुई होना
परिवार में पहले किसी को यह समस्या हुई होना
बढ़ती उम्र
निकट दृष्टि दोष (मायोपिया)
किसी वजह से रेटिना पतला या कमजोर पड़ना
रेटिना अलग होने का निदान
रेटिनल डिटैचमेंट के निदान के दौरान नेत्र रोग विशेषज्ञ (Ophthalmologist) आपकी आंख की करीब से जांच करेंगे और साथ ही आपको महसूस हो रहे लक्षणों के बारे में पूछेंगे। इसके बाद आपकी आंख में विशेष प्रकार की दवा डाली जाती है, जो आंखों को चौड़ा (डायलेशन) कर देती है और डॉक्टर करीब से आंख की जांच कर पाते हैं। परीक्षण दौरान अगर डॉक्टर को महसूस होता है, कि आपको रेटिनल डिटैचमेंट की समस्या हो सकती है, तो ऐसे में ऑफ्थैल्मोलोस्कोप नामक उपकरण का इस्तेमाल किया जाता है। यह उपकरण एक खास प्रकार का मैग्निफाइंग टूल होता है, जिसकी मदद से रेटिना की करीब से जांच की जा सकती है। साथ ही इस उपकरण की मदद से रेटिना में छिद्र या दरार का पता भी लगाया जा सकता है।
रेटिना अलग होने की रोकथाम
जैसा कि रेटिनल डिटैचमेंट की समस्या आमतौर पर उम्र बढ़ने के साथ-साथ विकसित होती है और ज्यादातर मामलों में इसकी रोकथाम करना संभव नहीं हो पाता है। हालांकि, कुछ बातों का ध्यान रख कर रेटिना अलग होने जैसी समस्याएं विकसित होने के खतरे को कम किया जा सकता है -
आंख संबंधी बीमारियों को बढ़ने न दें - अगर आपको निकट दृष्टि दोष है, तो समय-समय पर नेत्र रोग विशेषज्ञ से जांच कराते रहें। ऐसा इसलिए निकट दृष्टि दोष रेटिनल डिटैचमेंट का सबसे बड़ा खतरा है। साथ ही अगर आपको आंख संबंधी कोई अन्य बीमारी है, तो डॉक्टर की मदद से उसके लक्षणों को भी नियंत्रित रखें।
आंख में चोट लगने से बचें - खेल-कूद या अन्य कोई ऐसी गतिविधि करते समय जिस दौरान आंख में चोट लग सकती है, ऐसे में उचित सुरक्षा उपकरणों जैसे सेफ्टी गोगल व हेलमेट आदि का उपयोग करें।
शारीरिक रूप से सक्रिय रहें - अपनी जीवनशैली में अच्छी आदतें अपनाएं, रोजाना व्यायाम करें, संतुलित आहार लें और दवाएं समय पर लें। ऐसा करने से आपको अपनी आंखें स्वस्थ रखने में मदद मिल सकती हैं।
डॉक्टर के संपर्क में रहें - अगर आपको लगता है कि आपको रेटिनल डिटैचमेंट होने का खतरा है या फिर आपको इसके जैसे ही लक्षण महसूस हो रहे हैं, तो समय-समय पर डॉक्टर से जांच कराते रहें ताकि स्थिति के गंभीर होने से पहले ही उसका निवारण किया जा सके।
रेटिना अलग होने का इलाज
रेटिनल डिटैचमेंट के इलाज का मुख्य लक्ष्य रेटिना को फिर से जोड़ना होता है, जिसे सिर्फ सर्जरी प्रोसीजर की मदद से ही जोड़ा जा सकता है। रेटिना अलग होने का इलाज करने के लिए निम्न सर्जरी प्रोसीजर की जा सकती हैं -
लेजर ट्रीटमेंट या क्रायोथेरेपी तकनीक - इस तकनीक में रेटिना का फिर से आंख की सतह से जोड़ दिया जाता है। इस सर्जरी प्रोसीजर के दौरान मरीज को थोड़ी बहुत ही तकलीफ होती है और इसे डॉक्टर अस्पताल में ही कर देते हैं। लेजर ट्रीटमेंट या क्रायोथेरेपी तकनीक का इस्तेमाल आमतौर पर रेटिनल डिटैचमेंट के छिद्र या दरार को बढ़ने के रोकने के लिए किया जाता है।
न्यूमेटिक रेटिनोपेक्सी - यह अलग हुए रेटिना को ठीक करने वाली एक साधारण तकनीक है, लेकिन इसे रेटिनल डिटैचमेंट के सभी मामलों में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। इसमें सर्जन आंख के विट्रियस जेल में एक निश्चित मात्रा में गैस डालते हैं, जिसकी मदद से रेटिना और आंख की सतह के बीच की दरार को बंद कर दिया जाता है। यह गैस आंख से कुछ दिन या हफ्तों के बाद धीरे-धीरे अपने आप गायब हो जाती है।
स्क्लेरल बक्लिंग - इस तकनी में भी रेटिना के स्कार को ठीक करने के लिए क्रायोथेरेपी का इस्तेमाल किया जाता है। इसके दौरान रेटिना के अंदर जमा हुए द्रव को निकाल दिया जाता है और पुतली में एक विशेष आकृति वाले रबड़ के टुकड़े को लगा दिया जाता है। सिलिक़ॉन द्वारा बनी यह आकृति आंख की सतह को रेटिना से जोड़कर रखने मे मदद करती है।
विट्रिक्टॉमी सर्जरी - इस सर्जरी प्रोसीजर के दौरान आंख से विट्रियस जेल को निकाल दिया जाता है। अगर इस दौरान आंख में कोई दरार या छिद्र दिखाई देता है, तो क्रायोथेरेपी या लेजर तकनीक या गैस की मदद से उसका इलाज कर दिया जाता है। हालांकि, रेटिना को पोजीशन में रखने के लिए इन सर्जरी प्रोसीजरों के दौरान डॉक्टर के दिशा-निर्देशों को पालन करना बहुत जरूरी होता है।