Dr. Ramakrishna Reddy
Gynecologist
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प्रीमेन्स्ट्रुअल सिंड्रोम महिलाओं में देखी जाने वाली एक खास बीमारी है, जिसमें मासिक धर्म से कुछ दिन पहले कई शारीरिक व भावनात्मक लक्षण महसूस होने लगते हैं। दवाओं व जीवनशैली में सुधार करके इसके लक्षणों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
प्रीमेन्स्ट्रुअल सिंड्रोम (Premenstrual syndrome) या पीएमएस महिलाओं को होने वाली कई बीमारियों को एक समूह है। इसे हिंदी में प्रागार्तव कहा जाता है और इससे महिलाओं को मासिक धर्म होने से कुछ दिन पहले एक साथ कई लक्षण महसूस होने लगते हैं। पीएमएस के दौरान होने वाले लक्षण हर महिला के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। अधिकतर महिलाओं के अनुसार उन्हें प्रीमेन्स्ट्रुअल सिंड्रोम में कोई गंभीर लक्षण नहीं होता है, जबकि कुछ महिलाओं को इस दौरान होने वाले लक्षण काफी परेशान कर सकते हैं और इस कारण उनकी दिनचर्या भी प्रभावित कर सकती है। आमतौर पर प्रीमेन्स्ट्रुअल सिंड्रोम आपके मासिक चक्र में ओव्यूलेशन पूरा होने के बाद और मासिक धर्म की शुरुआत में होता है। ऐसे में जब पीरियड्स शुरू होते हैं, तो पीएमएस के लक्षण धीरे-धीरे कम होने लगते हैं। जिन महिलाओं को मासिक धर्म आते हैं, उन में हर चार में से तीन महिलाओं को पीएमएस के लक्षण होते हैं। आमतौर पर जिन महिलाओं की उम्र 30 के आसपास है, उन महिलाओं को यह सिंड्रोम होने का खतरा सबसे अधिक रहता है। दवाओं की मदद से इसके लक्षणों को काफी हद तक रोका जा सकता है और साथ ही जीवनशैली में सुधार व संतुलित आहार भी इस स्थिति को गंभीर होने से रोकने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
पीएमएस में होने वाले लक्षण शारीरिक व मानसिक दोनों हो सकते हैं, जो आमतौर पर शरीर के हार्मोन असंतुलन को दर्शाते हैं। महिलाओं को इसमें महसूस होने वाले लक्षण आमतौर पर कुछ दिनों से दो हफ्तों तक रह सकते हैं। प्रीमेन्स्ट्रुअल सिंड्रोम के दौरान महसूस होने वाले मानसिक व शारीरिक लक्षणों में आमतौर पर निम्न शामिल हैं - मानसिक लक्षण
प्रीमेन्स्ट्रुअल सिंड्रोम के कारण का सटीक रूप से अभी तक पता नहीं चल पाया है। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का यह मानना है कि यह हार्मोन के स्तर में होने वाले उतार-चढ़ाव के कारण होता है, जो हर महिला के मासिक धर्म से ठीक पहले, उसके दौरान और बाद में होते हैं। ओव्यूलेशन के बाद होने वाला पीएमएम आमतौर पर एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रोन नामक हार्मोन का स्तर में कम होने के कारण होता है और जब पीरियड्स के पहले इन हार्मोन का स्तर बढ़ने लगता है तो लक्षण भी सामान्य होने लगते हैं। प्रीमेन्स्ट्रुअल सिंड्रोम के जोखिम कारक कुछ स्वास्थ्य स्थितियां हैं, जो पीएमएस होने के खतरे को बढ़ा देती हैं, इनमें आमतौर पर निम्न शामिल हैं -
पीएमएस का निदान करना आवश्यक होता है, जिसमें मरीज डॉक्टर को स्वास्थ्य संबंधी सारी जानकारी देता है। इस दौरान मरीज से उसके लक्षणों की शुरुआत व समाप्ति के बारे में पूछा जाता है और साथ ही यह जानकारी भी ली जाती है कि परिवार में किसी को कोई मानसिक समस्या तो नहीं है। पीएमएस होने के पैटर्न को ठीक से समझने के लिए डॉक्टर पीरियड्स कब आते हैं और कब आपके पीएमएस के लक्षण शुरू व खत्म होते हैं आदि को डायरी में लिखने का सुझाव देते हैं। पीएमएस की पुष्टि करने के लिए डॉक्टर डायरी में पैटर्न समझते हैं और साथ ही कुछ मासिक धर्म को ट्रैक किया जाता है। महिलाओं को लगातार तीन बार पीरियड्स से एक हफ्ते पहले क्लिनिक बुलाया जाता है और इस दौरान उसके लक्षणों की जांच की जाती है।
अभी तक पीएमएस के सटीक कारण का पता नहीं चल पाया है और इस कारण से इसे विकसित होने से रोकना भी संभव नहीं है। हालांकि, जीवन शैली कुछ अच्छे बदलाव करके पीएमएस के लक्षणों को गंभीर होने से रोका जा सकता है, जिनमें निम्न शामिल हैं -
पीएमएस को इलाज के साथ पूरी तरह से ठीक करना संभव नहीं है, हालांकि, इसके लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है। डॉक्टर आपकी जीवनशैली में कुछ अच्छे बदलाव लाते हैं, जिनकी मदद से पीएमएस के लक्षणों को कम करने की सलाह दी जाती है। हालांकि, यदि स्थिति गंभीर है, तो इलाज करने के लिए निम्न दवाओं को इस्तेमाल में लाया जा सकता है -
पीएमएस से ग्रस्त लगभग 50 प्रतिशत महिलाओं को आमतौर पर कोई गंभीर लक्षण नहीं होता है, जबकि बाकी महिलाओं को उनके पीरियड्स शुरू होने से पहले गंभीर लक्षण होने लगते हैं। ऐसे में उन्हें निम्न जटिलताएं हो सकती हैं -