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कार्पल टनल सिंड्रोम (Carpal tunnel syndrome)या सीटीएस एक ऐसी स्थिति है, जिसमें आपकी कलाई की कोई नस दब जाती है, जिसके कारण आपके हाथ और पूरी बांह में तेज दर्द और अकड़न हो जाती है। ऐसा आपकी कलाई की मीडियन नर्व के दब जाने पर होता है। कार्पल, जिसे अंग्रेजी भाषा में कार्पस कहते हैं हिंदी में इसका मतलब होता है कलाई। कार्पस शब्द ग्रीक भाषा से लिया गया है। मेडिकल की भाषा में बात करें तो कार्पस आठ छोटी हड्डियों का एक समूह है, जो कलाई के आस-पास होती हैं। ये हड्डियां कलाई के दोनों ओर होती हैं, जो हाथ को कोहनी से जोड़ने का काम करती है। वहीं टनल से नौ से दस टेंडन और एक नस (मीडियन नर्व, जो कि कोहनी और कलाई के बीच में होती है) गुजरती हैं। ये सभी कार्पल बोन से गुजरती हैं और इनके ऊपर एक मजबूत लिगमेंट होता है, जिे फ्लेक्सर रेटिनकुलम (flexor retinaculum) कहते हैं। सीटीएस की स्थिति में एक से ज्यादा लक्षण दिखाई देते हैं, जिस कारण इसे सिंड्रोम कहा जाता है।
कार्पल टनल सिंड्रोम की गंभीरता को पांच चरणों में आंका जाता है, जिसमें हाथ में असामान्य झनझनाहट होना, कुछ महसूस न होना और अंगूठे की मांसपेशियों की कमजोरी भी शामिल है। आइए जानते हैं कौन सी हैं ये स्टेज। स्टेज 1: नोक्टेर्नल पैरास्थेसिया (Nocturnal paraesthesia ) हाथ के किसी भी हिस्से में महसूस हो सकती है, खासकर वहां, जहां से मीडियन नर्व होकर गुजरती है। स्टेज 2: ये स्थिति दिन के किसी भी वक्त हो सकती है और इसमें बार-बार हाथ में अकड़न हो जाती है। स्टेज 3 : मीडियन नर्व जहां-जहां से गुजरती है उस हिस्से में संवेदना महसूस नहीं होती है। स्टेज 4 : अंगूठे के नीचे वाली मांसपेशियों में कमजोरी और उनका ठीक न होना। स्टेज 5: अंगूठे के नीचे वाली मांसपेशियों के बड़े पैमाने पर पक्षाघात या फिर मसल्स मास में कमी, जिसके अंगूठा सही तरीके से काम नहीं कर पाता है।
सीटीएस से पीड़ित किसी भी व्यक्ति को उस जगह पर में दर्द, सुन्नपन या फिर पिन व सुई जैसी चुभने) का अनुभव होगा, जहां-जहां से मीडियन नर्व गुजरती है। बता दें कि मीडियन नर्व आपके हाथ के बाहरी आधे हिस्से से गुजरती है, जिसमें अंगूठा, तर्जनी, बीच वाली उंगली और रिंग फिंगर का आधा भाग शामिल है। जैसे-जैसे ये बीमारी बढ़ती है मरीज का प्रभावित हाथ और उंगुलियां किसी भी चीज को पकड़ने में कमजोर होती जाती है, साथ ही हाथ के बाहरी हिस्से की मांसपेशियों को भी नुकसान पहुंचता है। कभी-कभी कोहनी के आगे वाले भाग और कलाई में तेज दर्द हो सकता है।
नस का दबना कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसका पता लगाना असंभव नहीं है। इस तरह के मामलों में सीटीएस को आइडियोपैथिक कहा जाता है। यह सिंड्रोम अक्सर कलाई में चोट के परिणाम स्वरूप होता है या फिर ऐसी चिकित्सा स्थिति, जिसमें कलाई की मीडियन नर्व दब जाती है जैसे गठिया, मधुमेह, ऑस्टियोपोरोसिस, हाइपोथायरायडिज्म, मोटापा और यहां तक कि गर्भावस्था में भी ऐसा कभी-कभी हो जाता है। सीटीएस उन रोगियों में भी देखा जाता है, जो पीरियड की डेट आगे बढ़ाने वाली गोलियों का सेवन करती हैं या फिर मिर्गी के इलाज के लिए दवा का सेवन करते हैं। लिपोमा और कलाई में गांठ से भी नस पर दबाव पड़ता है, जिसके कारण कार्पल टनल सिंड्रोम हो सकता है। ऐसा देखा जाता है सीटीएस के लक्षण आमतौर पर बीच रात में दिखाई देते हैं। ये लक्षण कभी एक तो कभी दोनों कलाई पर दिखाई दे सकते हैं। आजकल, यह स्थिति आमतौर पर कंप्यूटर के उपयोग से जुड़ी हुई है और ये कंप्यूटर से जुड़ी हुई चोट का सबसे परिचित रूप है, जिसे सीआरआई कहते हैं। दरअसल यह चोट कलाई के अधिक उपयोग के कारण होती है। यह ज्यादातर उन लोगों को होती है, जो दिन भर कंप्यूटर पर टाइपिंग करते हैं या फिर दिन भर फोन पर चैट करते रहते हैं। ऐसा कलाई, अंगूठे या कंधे में मौजूद टेन्डंस में तनाव के अति-उपयोग के परिणामस्वरूप होता है। इस तरह की चोट को रिपिटिटिव स्ट्रेन इंजरी (RSI) कहा जाता है।
इस स्थिति से जुड़े कुछ जोखिम कारक हैं, जिनके बारे में आपको जानना आवश्यक है। आनुवंशिकता (Heredity) : ऐसा कुछ परिवारों में देखने को मिलता है, जिसके कारण कुछ लोगों में कार्पल टनल की संरचना में बदलाव या नस की आकार या जगह में परिवर्तन हो जाता है। आयु (Age) : ये स्थिति 50 की उम्र के बाद व्यक्तियों में ज्यादा देखी जाती है। लिंग (Gender) : ये स्थिति पुरुषों की तुलना में महिलाओं को अधिक होती है। हार्मोनल (Hormonal changes) : गर्भावस्था के दौरान होने वाले कुछ हार्मोनल परिवर्तन महिलाओं में सीटीएस के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। वजन (Weight) : मोटे लोगों को सीटीएस का अधिक जोखिम होता है। आदतें (Habits) : धूम्रपान और शराब। व्यवसाय (Occupations) : कुछ तरह का काम करने वाले लोगों को सीटीएस का अधिक जोखिम होता है जैसे कंप्यूटर यूजर्स, ट्रांसक्रिप्शनिस्ट, फैक्ट्री वर्कर, कसाई, नाई, चौकीदार, संगीतकार, वाहन चालक और कैशियर।
इस तरह की स्थिति में रोगी को लक्षणों को कम करने के साथ-साथ इलाज का प्रभाव जानने के लिए अपनी जीवन शैली में बदलाव करने की जरूरत होती है। चूंकि यह स्थिति कलाई के अति प्रयोग के कारण होती है इसलिए रोगी को काम के दौरान बार-बार ब्रेक लेना चाहिए, दर्द वाले हिस्से को आराम देना चाहिए, खासकर जब आप कुछ दिक्कत महसूस करते हैं। अगर लक्षण फिर भी कम नहीं हो रहे हैं तो डॉक्टर से सलाह लें। अपनी कलाई को सीधी रखने के लिए किसी गैजेट का इस्तेमाल कर सकते हैं, जिससे कलाई पर अत्यधिक दबाव को रोकने में मदद मिल सकती है। रात के समय स्प्लिंट पहनने से आपकी कलाई को सही स्थिति में बनाए रखने में मदद मिल सकती है। अंगूठे पर किसी तरह का बेवजह तनाव न पड़े इसके लिए आप किसी भी चीज को पकड़ने के लिए अपने पूरे हाथ और उंगलियों का उपयोग करें। सीटीएस से संबंधित लक्षणों और दर्द से राहत पाने के लिए जब भी आप घर पर हो तो आराम करें और दर्द कम है तो एक्सरसाइज करना न भूलें। मांसपेशियों की ताकत को बढ़ाने में एक्सरसाइज आपकी मदद कर सकती है साथ ही इसके लक्षणों को कम करने में मदद मिल सकती है। अंत में, सीटीएस का सही समय पर उपचार आवश्यक है। लक्षणों को अनदेखा करने से केवल और ज्यादा नुकसान होगा।
सीटीएस के लक्षण बहुत विशिष्ट होते हैं, इसलिए इनका पता लगाना बहुत मुश्किल नहीं है। डॉक्टर, मरीज के पिछले मेडिकल इतिहास को देखकर या फिर डरकन टेस्ट या फिर टिनल संकेत (एक पिन और सुई को चुभोकर होने वाली संवेदना) से जांच कर सकता है। फलेन टेस्ट के जरिए भी लक्षणों को दोबारा से देखा जा सकता है, इस टेस्ट में शारीरिक परीक्षण किया जाता है, जो सीटीएस की पुष्टि करता है। चोट या गठिया की जांच के लिए एक्स-रे की सलाह दी जा सकती है। डॉक्टर्स इस रोग का पता लगाने के लिए नर्व कंडक्शन वेलोसिटी टेस्ट (NCV) कराने की भी सलाह दे सकता है। इसके अलावा इलेक्ट्रोमोग्राम (ईएमजी) मांसपेशियों में विद्युत गतिविधि को मापकर मांसपेशियों को हुए नुकसान को दिखा सकता है। इसके साथ ही मीडिया नस कहीं दब तो नहीं रही इसको जांचने के लिए अल्ट्रासाउंड किया जा सकता है। कलाई और हाथ के दर्द के बीच अंतर का निदान इस प्रकार किया जाता है: डी कर्वेन टेंडनसिस : मुट्ठी बनाने या फिर हाथ मिलाने के दौरान दर्द का अनुभव। ट्रिगर फिंगर : अंगूठे और अन्य उंगलियों को मोड़ने पर दर्द और अकड़न महसूस होना। गठिया : जो जोड़ों में सूजन या अकड़े हुए जोड़ों के कारण दर्द का अनुभव होता है।
जब किसी व्यक्ति में इस रोग का पता चलता है तो घबराने के जरूरत नहीं है क्योंकि इस रोग के उपचार के कई विकल्प होते हैं। इसे गैर-सर्जिकल और सर्जिकल विकल्पों में बांटा जा सकता है। जीवनशैली में बदलाव के साथ, इस स्थिति का उचित इलाज करना काफी आसान है। गैर-सर्जिकल विकल्प उन मामलों में काबिल होते हैं, जहां रोगी में सीटीएस का कम गंभीर रूप से सक्रिय होता है। इन गैर-सर्जिकल विकल्पों में शामिल हैंः स्प्लिंट्स: कलाई को सहारा देने के लिए विशेष रूप से रात के वक्त ब्रेसेस और स्प्लिंट्स प्रयोग करने की सलाह दी जाती है। फिजियोथेरेपी और एक्सरसाइज : रोगी में इस रोग का पता चलने के बाद उसे सीटीएस के इलाज के लिए विशेष एक्सरसाइज करने की सलाह दी जाती है, जिसमें उसे ऊपरी अंग की मांसपेशियों को टोन करना सिखाया जाता है ताकि लक्षणों की गंभीरता को कम किया जा सके। इस एक्सरसाइज का उद्देश्य कार्पल टनल को फैलाना होता है ताकि प्रभावित नर्व के लिए कुछ जगह बनाई जा सके। स्टेरॉयड इंजेक्शन: ये इंजेक्शन सूजन को कम कर अस्थायी रूप से लक्षणों को कम करने में मदद करते है। हालांकि इसे स्थायी या लंबे समय तक टिकने वाले उपचार के रूप में नहीं देखा जाता है। अगर इस रोग के लक्षण गैर-सर्जिकल तरीके से कम नहीं होते हैं तो फिर सर्जरी की सलाह दी जाती है। सीटीएस के लिए सर्जिकल विकल्पों में शामिल हैंः सर्जिकल तरीके से कार्पल टनल रिलीज करना : इस सर्जरी को ओपन सर्जरी या एंडोस्कोपी भी कह सकते हैं। इस सर्जरी में नर्व को अधिक स्थान देने के लिए रेटिनाकुलम को विभाजित किया जाता है। यह सर्जरी उन रोगियों की जाती है जिनपर दूसरे उपचार विकल्प काम नहीं करते हैं। अब तक, यह समस्या का एकमात्र स्थायी समाधान है। इस ऑपरेशन के परिणाम आमतौर पर अच्छे देखने को मिलते हैं और लक्षणों के दोबारा होने की संभावना काफी कम होती है। सर्जरी के 2-3 महीने बाद आपकी ग्रिप बेहतर होना शुरू हो जाती है। हालांकि ऑपरेशन की एक गंभीर जटिलता ये सामने आती है कि आपका अंगूठे में अकड़न हो सकती है।
ये स्थिति हमारे दैनिक जीवन में कई गतिविधियां का ही एक कारण है, इसलिए भविष्य में ये स्थिति दोबारा न हो इससे बचने के लिए हमें ऐसे उपाय करने चाहिए, जो फायदेमंद हो जैसे कार्यस्थल में परिवर्तन। बॉडी के सही पोश्चर बनाए रखने पर ध्यान देना चाहिए। हाथ और कलाई की स्थिति को बनाए रखने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। काम से लगातार ब्रेक लेना चाहिए क्योंकि कलाई पर अत्यधिक खिंचाव पड़ने से ही ये स्थिति पैदा होती है। सोते समय आपकी पोजिशनिंग सही होनी चाहिए इसके अलावा, कार्यस्थल पर उपयोग किए जाने वाले उपकरणों का मूल्यांकन और सही तरीके से उपयोग सीटीएस के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।
सर्जरी से ठीक होने में ज्यादा समय नहीं लगता है। सर्जरी के कुछ दिन बाद ही टांके हटा दिए जाते हैं। सर्जरी के टांके हटाने के लगभग 14 दिनों बाद आपको लक्षणों से राहत मिल जाती है। अधिकांश व्यक्ति अच्छी तरह से ठीक हो जाते हैं और लगभग 6 सप्ताह के बाद आप अपनी सामान्य गतिविधियां फिर से शुरू कर सकते हैं। लगातार आराम करने, स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज करने और कलाई की सही मुद्रा जैसी चीजों को करने से आपको आराम मिलता है। जटिलताएं अगर आप इस स्थिति का इलाज नहीं कराते हैं तो आप ऐसी समस्या का शिकार हो सकते हैं, जो जल्दी ठीक नहीं हो सकती है। जिसके कारण आपको जीवन भर असहनीय दर्द, अकड़न और मांसपेशियों की कमजोरी का शिकार होना पड़ेगा।
कुछ लोगों को इस रोग में आराम देने का काम किया है योग ने। योग एक तरह का वैकल्पिक उपचार साबित हुआ है, जो इस तरीके को दर्द कम करने और ताकत में सुधार में फायदेमंद साबित हुआ है।