Dr. Gokul Ratakonda
Psychiatrist
ऑटिज़्म (Autism) को मेडिकल भाषा में ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर (autism spectrum disorder) कहते हैं। यह एक विकास संबंधी गड़बड़ी है जिससे पीड़ित व्यक्ति को बातचीत करने में, पढ़ने-लिखने में और समाज में मेलजोल बनाने में परेशानियां आती हैं। ऑटिज़्म एक ऐसी स्थिति है जिससे पीड़ित व्यक्ति का दिमाग अन्य लोगों के दिमाग की तुलना में अलग तरीके से काम करता है। वहीं, ऑटिज़्म से पीड़ित लोग भी एक-दूसरे से अलग होते हैं। यानि कि आटिज्म के अलग-अलग मरीजों को अलग-अलग लक्षण महसूस हो सकते हैं। हालांकि इस बीमारी के बारे में अभी तक बहुत ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है और न ही वर्तमान में इसका कोई कम्प्लीट इलाज है। वैसे तो इस बीमारी से पीड़ित लोग नौकरी करने, परिवार और दोस्तों के साथ मेल-मिलाप करने में सक्षम होते हैं, लेकिन कई बार उन्हें इसके लिए दूसरों की मदद लेनी पड़ती है। जहां कुछ ऑटिस्टिक लोगों को पढ़ने-लिखने में परेशानी होती है तो वहीं ऑटिज्म के कुछ मरीज या तो पढ़ने लिखने में बहुत तेज होते हैं या सामान्य होते हैं। परिवार, टीचर्स या दोस्तों के सहयोग से ये लोग नई स्किल्स सीखने में भी सक्षम होते हैं और बिना किसी सहारे के काम कर पाते हैं। कुछ स्टडीज़ में ऐसा देखा गया है कि डायग्नोसिस और इंटरवेंशन ट्रीटमेंट सर्विसेज़ की जल्द मदद से ऑटिस्टिक लोगों को सामाजिक व्यवहार और नयी स्किल्स सीखने में मदद मिलती है जिससे, वे अपना जीवन बेहतर तरीके से जी पाते हैं।
ऑटिज़्म के तीन प्रकार निम्न हैं: 1.ऑटिस्टिक डिसॉर्डर (क्लासिक ऑटिज़्म): यह ऑटिज़्म का सबसे आम प्रकार है। जो लोग ऑटिज्म के इस डिसऑडर से प्रभावित होते हैं उन्हें सामाजिक व्यवहार में और अन्य लोगों से बातचीत करने में मुश्किलें होती हैं। साथ ही असामान्य चीज़ों में रूचि होना, असामान्य व्यवहार करना, बोतले समय अटकना, हकलाना या रूक-रूक कर बोलने जैसी आदतें भी ऑटिस्टिक डिसॉर्डर के लक्षण हो सकते हैं। वहीं, कुछ मामलों में बौद्धिक क्षमता में कमी भी देखी जाती है। 2.अस्पेर्गेर सिंड्रोम: इस सिंड्रोम को ऑटिस्टिक डिसऑडर का सबसे हल्का रूप माना जाता है। इस सिंड्रोम से पीड़ित व्यक्ति कभी कभार अपने व्यवहार से भले ही अजीब लग सकते हैं लेकिन, कुछ खास विषयों में इनकी रूचि बहुत अधिक हो सकती है। हालांकि इन लोगों में मानसिक या सामाजिक व्यवहार से जुड़ी कोई समस्या नहीं होती है। 3.पर्वेसिव डेवलपमेंट डिसॉर्डर: आमतौर पर इसे ऑटिज़्म का प्रकार नहीं माना जाता है। कुछ विशेष स्थितियों में ही लोगों को इस डिसॉर्डर से पीड़ित माना जाता है।
इस बीमारी के लक्षण आमतौर पर 12-18 महीनों की आयु में (या इससे पहले भी) दिखते हैं जो सामान्य से लेकर गम्भीर हो सकते हैं। ये समस्याएं पूरे जीवनकाल तक रह सकती हैं। नवजात शिशु जब ऑटिज्म का शिकार होते हैं उनमें विकास के निम्न संकेत दिखाई नहीं देते हैं-
कारण अभी तक ऑटिज्म के सही कारणों का पता नहीं चल सका है। हालांकि, विभिन्न स्टडीज़ में कहा गया गया है कि यह डिसऑर्डर कुछ अनुवांशिक और पर्यावरणीय कारणों से होता है। जो कि गर्भ में पल रहे बच्चे के दिमाग के विकास को बाधित करते हैं। जैसे-
चूंकि अध्ययनों में अभी तक ऑटिज़्म के कारणों का सही तरीके से पता नहीं चल सका है, इसीलिए वर्तमान में इस डिसऑर्डर से बचाव के कोई कारगर उपाय भी उपलब्ध नहीं है।
फिलहाल, ऑटिज़्म के डायग्नोसिस या निदान के लिए कोई विशिष्ट टेस्ट नहीं है। आमतौर पर, अभिभावकों को बच्चे के व्यवहार और उनके विकास पर ध्यान देने के लिए कहा जाता है। ताकि, डिसऑर्डर का पता लगाने में मदद हो। विशेषज्ञों द्वारा मरीज की देखने, सुनने, बोलने और मोटर कॉर्डिनेशन की क्षमता का आंकलन किया जाता है। यदि बच्चे में निम्न प्रकार के लक्षण दिखाई देते हैं तो उसे ऑटिज़म से पीड़ित माना जाता है :
वर्तमान में ऑटिज़्म के लिए कोई उपचार उपलब्ध नहीं है। हालांकि, स्टडीज़ में ऐसे संकेत दिए गए हैं जिसमें बचपन में ही इंटरवेंशनल ट्रीटमेंट सर्विसेज़ की मदद से ऑटिस्टिक बच्चों को पढ़ने-लिखने जैसी ज़रूरी स्किल्स सीखने में सहायता मिल सके। इसमें एजुकेशनल प्रोग्राम और बिहेवियरल थेरेपी के साथ-साथ ऐसे स्किल्स ओरिएंटेड ट्रेनिंग सेशन्स भी कराए जाते हैं जो बच्चों को बोलना, सामाजिक व्यवहार और सकारात्मक व्यवहार सीखने में मदद करते हैं। चूंकि, हर व्यक्ति में ऑटिज़्म के लक्षण अलग अलग होते हैं, इसलिए हर व्यक्ति को विशेष उपचार देने से ही बेहतर परिणाम प्राप्त हो सकते हैं। ऑटिज़्म के मुख्य लक्षणों का इलाज करने में दवाइयां कारगार नहीं होती हैं। लेकिन वे बेचैनी, डिप्रेशन, सनकी और जुनूनी व्यवहार को कंट्रोल करने में मदद कर सकती हैं, जो आमतौर पर ऑटिज्म के मरीजों में देखी जाती है। डॉक्टर ऑटिज़्म के मरीजों को निम्न दवाइयों के सेवन की सलाह भी दे सकते हैं: एंटी-एंग्जायटी दवाइयां (बेचैनी वाले व्यवहार को कंट्रोल करने के लिए) चिड़चिड़ापन, गुस्सा और बार-बार एक जैसा व्यवहार दोहराने आदि से राहत के लिए एंटीसायकोटिक दवाइयां दी जाती हैं। अशांत और बेचेनीभरे व्यवहार से राहत के लिए सेंट्रल नर्वस सिस्टम स्टिमुलैंट्स दवा डिप्रेशन और बार-बार दोहरानेवाले व्यवहार से राहत के लिए एंटीडिप्रेसेंट्स दवा
ऐसे बच्चे जो ऑटिज़्म से पीड़ित हैं उनके लिए ये लाइफस्टाइल से जुड़े बदलाव मददगार साबित हो सकते हैं: बच्चे की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में मदद ऐसे करें : 1. बच्चों के साथ कम्युनिकेशन को आसान बनाएं
ऑटिज़्म जीवनभर रहनेवाली एक समस्या है। ऐसे में बच्चे को हमेशा विशेष सहयोग और सपोर्ट की ज़रूरत पड़ सकती है। हालांकि, उम्र बढ़ने के साथ ऑटिज़्म के लक्षण कम होने लगते हैं। जिससे, वह आगे चलकर सामान्य लोगों की तरह जीवन जी पाते हैं। इसलिए ऑटिस्टिक बच्चे के माता-पिता को बच्चे की बदलती ज़रूरतों के साथ तालमेल बिठाने के लिए तैयार रहना चाहिए।
ऑटिज्म से पीड़ित लोगों को आमतौर पर ये समस्याएं होती हैं : डिस्लेक्सिया: ऐसे लोगों को अक्षर पहचानने, लिखने और पढ़ने में दिक्कत होती है। डिस्प्रेक्सिया : इन समस्या से पीडित लोगों को सुस्ती और दूसरों द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुसार काम करने में परेशानी होती है। अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसॉर्डर: इस स्थिति में लोगों का ध्यान आसानी से भटक जाता है और उन्हें एकाग्र रहने में दिक्कत होती है। ऐसे लोगों को स्कूल और काम की जगहों पर अतिरिक्त सहयोग की ज़रूरत पड़ सकती है। अनिद्रा या इंसोमेनिया: अनिद्रा से पीड़ित लोगों के लिए ठीक तरीके से सो पाना संभव नहीं होता। लर्निंग डिसेबिलिटी: इसमें लोगों को नयी चीज़ें सीखने, किसी कठिन विषय या जानकारी को समझ पाना और खुद का ध्यान रखने में भी दिक्कत होती है। मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स: ऑटिज़्म के मरीज़ों में बेचैनी (ज़्यादातर समय चिंताग्रस्त रहना), ऑब्सेसिव कम्पल्सिव डिसॉर्डर यानि किसी काम को करने की सनक या जूनून छाया रहता है। ऐसे लोगों में डिप्रेशन (निराशा और दुख) जैसी भावनाएं हमेशा रहती हैं। मिर्गी: इस समस्या से पीड़ित लोगों को हाथों-पैरों में हमेशा सरसराहट सी महसूस होती रहती है। साथ ही इन्हें स्वाद और गंध महसूस होती है। जोड़ों में दर्द: कुछ ऑटिस्टिक लोगों को जोड़ों और घुटनों में दर्द महसूस होता है। इसके अलावा ऑटिज़्म में कब्ज या कॉन्स्टिपेशन और डायरिया जैसी समस्याएं होती हैं।
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