Dr. Bhushan Ambadkar
Psychiatrist
अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर को एडीएचडी के नाम से भी जाना जाता है, जो आमतौर पर बचपन में होने वाला एक न्यूरोडेवलपमेंटल डिसऑर्डर है। हिंदी में इस विकार को ध्यानाभाव एवं अतिसक्रियता विकार के नाम से जाना जाता है। एडीएचडी से ग्रसित व्यक्ति अपनी स्वैच्छिक प्रतिक्रियाओं को रोक नहीं पाता है। एडीएचडी के दौरान होने वाली इन प्रतिक्रियाओं में आमतौर पर स्पीच से लेकर शारीरिक गतिविधि जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं। एडीएचडी के विशिष्ट कारणों के बारे में अभी तक पता नहीं चला है, हालांकि, अनुवांशिक, वातावरण आहार, मानसिक और सामाजिक पहलुओं से जुड़े ऐसे कई कारक हैं, जो इस रोग के होने के खतरे को बढ़ा देते हैं। एडीएचडी का खतरा बढ़ाने वाले वातावरणीय कारकों में आमतौर पर गर्भावस्था के दौरान शराब पीना, सिगरेट के धुंएं के संपर्क में आना और सीसा के संपर्क में आना आदि शामिल है। जन्म के दौरान होने वाली जटिलताएं भी अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर का खतरा बढ़ा सकती है, जिनमें आमतौर पर समय से पहले जन्म लेना, गर्भावस्था के दौरान संक्रमण, समय से पहले जन्म लेना और इससे जुड़े अन्य कई कारक शामिल हैं।
एडीएचडी एक न्यूरोडेवलपमेंटल डिसऑर्डर है, जिसे प्रमुख रूप से चार प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है -
एडीएचडी की शुरुआत में इससे ग्रसित व्यक्ति का व्यवहार काफी सामान्य प्रतीत होता है। एडीएचडी में होने वाली ज्यादातर व्यवहार संबंधी असामान्यताएं भी बच्चे की उम्र बढ़ने के साथ-साथ कम होती रहती हैं। अगर किसी बच्चे में एडीएचडी के लक्षण 6 महीने से भी ज्यादा समय तक रहते हैं और बच्चे के जीवन के सभी पहलुओं को प्रभावित करते हैं जैसे खेल के दौरान, घर के कार्य में और स्कूल की पढ़ाई में आदि तो ऐसे में माता-पिता के लिए यह एक चिंता का विषय होना चाहिए। डॉक्टर देशपांडे के अनुसार अगर बच्चे में सिर्फ पढ़ाई के दौरान ही एडीएचडी के लक्षण महसूस हो रहे हैं और बच्चा खेल व घर पर की जाने वाली गतिविधियों के दौरान शांत है, तो हो सकता है कि यह स्थिति एडीएचडी से संबंधित न हो। एडीएचडी के लक्षण कम, मध्यम और गंभीर हो सकती हैं। एडीएचडी से ग्रसित बच्चों में निम्न लक्षण देखे जा सकते हैं -
शोधकर्ता अब तक एडीएचडी के सटीक कारणों का पता नहीं लगा पाए हैं, हालांकि, ऐसा माना जाता है कि यह कुछ निश्चित कारकों के संयोजन का परिणाम है। एडीएचडी के कारण व उससे पड़ने वाले प्रभाव का पता लगाने के लिए अभी भी कई अध्ययन चल रहे हैं। हालांकि, इस विकार को पैदा करने वाले कुछ सामान्य कारणों के बारे में नीचे बताया गया है -
ऐसे कई कारक हैं जो अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर विकसित होने के खतरे को बढ़ा देते हैं -
एडीएचडी का डायग्नोस करने के लिए अभी तक कोई विशेष टेस्ट तैयार नहीं किया गया है। हालांकि, डॉक्टर कुछ अन्य जांच कर सकते हैं और साथ ही मरीज की स्थिति से जुड़ी कुछ जानकारियां ले सकते हैं जिससे रोग का निदान करने में मदद मिल सकती है। कॉनर्स रेटिंग स्केल का इस्तेमाल करना भी एडीएचडी का निदान करने के लिए काफी सहायक तकनीक हो सकती है। यह एक प्रश्नावली होती है, जिसमें 27 प्रश्न होते हैं और इसे माता-पिता द्वारा भरा जाना होता है। वहीं एक दूसरी प्रश्नावली भी होती है, जिसमें 28 प्रश्न होते हैं और इसे बच्चे या उसके टीचर के द्वारा भरा जाता है। इन प्रश्नावलियों में दिए गए लक्षण आमतौर पर बच्चे के व्यवहार से जुड़े होते हैं। इन सवालों के दिए गए जवाबों के अनुसार स्थिति का निदान किया जाता है।
एडीएचडी को पूरी तरह से ठीक करने के लिए अभी तक कोई ट्रीटमेंट तैयार नहीं किया जा सका है, हालांकि, उपलब्ध इलाज की मदद से इसके लक्षणों को नियंत्रित करना अनिवार्य है। एडीएचडी के इलाज में आमतौर पर दवाएं, अलग-अलग प्रकार का फिजियोथेरेपी, एजुकेशन और अन्य इलाज प्रक्रियाएं शामिल हैं।
अगर अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर को इलाज किए बिना ही छोड़ दिया जाए तो उसे व्यक्ति को अपने परिवार व मित्रों को साथ सही संबंध बनाए रखने में दिक्कत हो सकती है। एडीएचडी से ग्रसित किशोरों में सड़क दुर्घटना के मामले सबसे अधिक पाए जाते हैं। वहीं एडीएचडी से ग्रसित वयस्कों में जॉब की कमी और तलाक के मामले काफी ज्यादा देखे गए हैं।